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हाई कोर्ट: जग्गी हत्याकांड में 23 साल बाद पलटा फैसला, अमित जोगी को सरेंडर का आदेश

बिलासपुर हाई कोर्ट ने CBI की अपील स्वीकार कर बदला फैसला


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने गुरुवार को बड़ा और अहम फैसला सुनाते हुए पूरे मामले को नई दिशा दे दी। अदालत ने पूर्व में पारित आदेशों को पलटते हुए सीबीआई की अपील स्वीकार कर ली है और इस मामले के प्रमुख आरोपी अमित जोगी को दोषी मानते हुये तीन सप्ताह के भीतर न्यायालय में आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश दिया है। डिवीजन बेंच के इस आदेश से करीब 23 वर्ष पुराने इस हत्याकांड में एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया तेज हो गई है और मामले ने नया मोड़ ले लिया है। आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र हैं अमित जोगी जो वर्तमान में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसीजे) के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। हालांकि पिता की मृत्यु के बाद अमित जोगी का राजनैतिक भविष्य करीब-करीब हाशिये पर ही था। 

 सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फिर खुली फाइल

दरअसल, इस मामले में सतीश जग्गी और CBI ने पूर्व में हाई कोर्ट के आदेशों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर 2025 को पारित आदेश में याचिका दायर करने में हुई देरी को क्षमा करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट वापस भेज दिया था। साथ ही निर्देश दिया था कि सुनवाई के दौरान CBI, राज्य शासन और वास्तविक शिकायतकर्ता को आवश्यक पक्षकार बनाया जाए।

 डिवीजन बेंच ने पलटे पुराने फैसले

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच में हुई सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलें सुनी गईं। CBI की ओर से अधिवक्ता वैभव ए. गोवर्धन तथा राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता डॉ. सौरभ पांडे ने संयुक्त रूप से पक्ष रखा। अदालत को बताया गया कि वर्ष 2007 में ही निचली अदालत के फैसले के विरुद्ध अपील की अनुमति मांगी गई थी, जिसे बाद में तकनीकी आधारों पर खारिज कर दिया गया था। सुनवाई के बाद कोर्ट ने वर्ष 2011 में पारित आदेशों को पलटते हुए CBI की अपील को स्वीकार कर लिया।

 तकनीकी आधार पर खारिज हुई थीं याचिकाएं

गौरतलब है कि इससे पहले हाई कोर्ट ने राज्य की अपील को अस्वीकार्य मानते हुए खारिज किया था। CBI की याचिका को विलंब के आधार पर निरस्त कर दिया गया था। वहीं सतीश जग्गी की पुनरीक्षण याचिका भी खारिज हो गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इन सभी बिंदुओं पर पुनर्विचार किया गया।

अमित जोगी को तीन सप्ताह में सरेंडर का आदेश

ताजा फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि आरोपी अमित जोगी तीन सप्ताह के भीतर न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करें। साथ ही कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि गंभीर आपराधिक मामलों में केवल तकनीकी आधारों पर अपीलों को खारिज करना न्याय के हित में नहीं माना जा सकता।

 क्या है पूरा हत्याकांड?

4 जून 2003 को रामअवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने 31 आरोपियों को नामजद किया था। ट्रायल के दौरान दो आरोपी सरकारी गवाह बन गए, जबकि 28 आरोपियों को दोषी ठहराया गया। हालांकि, अमित जोगी को बाद में बरी कर दिया गया था, जिसे लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई जारी थी।

 कौन थे रामअवतार जग्गी?

रामअवतार जग्गी व्यवसायिक पृष्ठभूमि से जुड़े प्रभावशाली नेता थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के करीबी माने जाते थे। जब विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस छोड़कर NCP में शामिल हुए, तब जग्गी भी उनके साथ पार्टी में गए और उन्हें छत्तीसगढ़ में NCP का कोषाध्यक्ष बनाया गया था।

 राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े इस मामले के फिर से सक्रिय होने से आने वाले दिनों में कई अहम घटनाक्रम सामने आने की संभावना है।

हत्याकांड में ये हैं दोषी 

 जग्गी हत्याकांड में अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, राकेश चंद्र त्रिवेदी, अवनीश सिंह लल्लन, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, सुनील गुप्ता, राजू भदौरिया, अनिल पचौरी, रविंद्र सिंह, रवि सिंह, लल्ला भदौरिया, धर्मेंद्र, सत्येंद्र सिंह, शिवेंद्र सिंह परिहार, विनोद सिंह राठौर, संजय सिंह कुशवाहा, राकेश कुमार शर्मा, (मृत) विक्रम शर्मा, जबवंत और विश्वनाथ राजभर दोषी हैं। 

 न्यायालय से मिली जीत के बाद स्वर्गीय रामवतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने मीडिया से बात करते हुये इसे सत्य की जीत बताया और न्याय वयवस्था के प्रति आभार प्रकट किया। 

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