BILASPUR POLICE: महालक्ष्मी में लूट से पहले भाजपा पार्षद बंधू मौर्य के हत्या की थी साजिश, नारद मुख्य कड़ी


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  सराफा कारोबारी संतोष तिवारी से हुई तीन करोड़ रुपये की सनसनीखेज लूट के मामले की जांच के दौरान पुलिस को एक और चौंकाने वाला खुलासा हाथ लगा है। गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ में भाजपा पार्षद एवं एमआईसी सदस्य बंधु मौर्य की हत्या की सुपारी दिए जाने का मामला सामने आया है। इस मामले में पुलिस ने भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के बेलतरा पूर्वी मंडल अध्यक्ष राजू सोनकर और शहर के निगरानी बदमाश नारद उर्फ सुमित श्रीवास को गिरफ्तार कर लिया है।

जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह ने सोमवार को बिलासा गुड़ी में आयोजित पत्रकार वार्ता में मामले का खुलासा करते हुए बताया कि सराफा कारोबारी लूटकांड में गिरफ्तार एक आरोपित ने पूछताछ के दौरान बताया कि राजू सोनकर ने बंधु मौर्य की हत्या कराने के लिए नारद श्रीवास को 25 लाख रुपये की सुपारी दी थी। इस सौदे के तहत छह लाख रुपये एडवांस भी दिए गए थे। पुलिस ने खुलासे के आधार पर त्वरित कार्रवाई करते हुए राजू सोनकर और नारद श्रीवास को गिरफ्तार कर लिया है। 

एसएसपी ने बताया कि जांच में सामने आया है कि 27 खोली क्षेत्र निवासी नारद श्रीवास ने करीब चार महीने पहले मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के निवासी विनोद उर्फ बिन्त्रू प्रजापति से संपर्क किया था। उसने विनोद को “बड़ा काम” होने की बात कहकर बिलासपुर बुलाया। इसके बाद विनोद अपने साथियों विजय लांबा, रिंकू गगनदीप और आमिर के साथ बिलासपुर पहुंचा और सभी आरोपित होटल सेलिब्रेशन में ठहरे।

यहीं पर चांटीडीह निवासी राजू सोनकर और नारद श्रीवास ने आरोपितों के साथ बैठक की। बैठक में बंधु मौर्य के साथ रास्ते को लेकर हुए विवाद का हवाला देते हुए उनकी हत्या की सुपारी 25 लाख रुपये में तय की गई। इस दौरान छह लाख रुपये एडवांस के रूप में आरोपितों को दिए गए। हत्या की साजिश को अंजाम देने से पहले आरोपितों ने बंधु मौर्य की गतिविधियों की रेकी की। रेकी के दौरान यह जानकारी जुटाई गई कि बंधु मौर्य प्रतिदिन शाम को घर लौटते समय अपने साथ पांच से दस लाख रुपये तक नकद रखते हैं। 

पुलिस के अनुसार आरोपितों ने 18 दिसंबर को चांटीडीह कॉम्पलेक्स के पास बंधु मौर्य को रोककर लूट और हत्या की संयुक्त वारदात को अंजाम देने की योजना बनाई थी। हालांकि, आरोपित अपनी योजना में सफल नहीं हो सके और वारदात को अंजाम दिए बिना ही वहां से भाग निकले। इसके बाद आरोपितों ने अपने खर्च की भरपाई करने के उद्देश्य से 19 दिसंबर की सुबह करीब छह बजे जबड़ापारा क्षेत्र में होटल व्यवसायी लखन देवांगन उर्फ निटी को लूटने का प्रयास किया, लेकिन इस वारदात में भी उन्हें सफलता नहीं मिली।

दोनों वारदातों में असफल रहने के बाद सभी आरोपित बिलासपुर से भागकर मध्यप्रदेश के अनूपपुर चले गए। पुलिस ने सराफा कारोबारी संतोष तिवारी लूटकांड की जांच के दौरान तकनीकी साक्ष्यों और पूछताछ के आधार पर आरोपितों को गिरफ्तार किया, जिसके बाद इस सुपारी कांड का खुलासा हुआ।

एसएसपी रजनेश सिंह ने बताया कि मामले में शामिल अन्य आरोपितों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। साथ ही सुपारी किलिंग की साजिश में प्रयुक्त संसाधनों और आर्थिक लेनदेन के संबंध में भी विस्तृत जांच जारी है। उन्होंने कहा कि शहर में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस तरह के आपराधिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और किसी भी साजिश को सफल नहीं होने दिया जाएगा। 

खुद को बड़ा गुंडा बताकर गैंग को किया प्रभावित

जांच में यह भी सामने आया है कि 27 खोली निवासी नारद श्रीवास पहले डबरीपारा क्षेत्र में रहता था। उसने विनोद और विजय की गैंग के सामने खुद को बिलासपुर का बड़ा गुंडा बताया था। इतना ही नहीं, उसने प्रेस क्लब को अपना ऑफिस बताकर पुलिस और पत्रकारों से करीबी संबंध होने का दावा किया था और गिरफ्तारी की स्थिति में बचाने का भरोसा भी दिलाया था। नारद की बातों से प्रभावित होकर बाहरी बदमाश उसकी योजना में शामिल हो गए।

घर से हथियार, प्रेस आईडी और नकदी बरामद

पुलिस ने नारद श्रीवास के घर की तलाशी ली, जहां उसकी आलमारी से दो देशी कट्टा, चार से अधिक बटन चाकू, प्रेस के दो आईडी कार्ड और 5.33 लाख रुपये नकद बरामद किए गए। पुलिस के अनुसार नारद सिविल लाइन थाना क्षेत्र का निगरानी बदमाश है और उसके खिलाफ हत्या, लूट और अन्य गंभीर अपराधों सहित 11 से अधिक मामले दर्ज हैं।

पुलिस की इस कार्रवाई से शहर में सनसनी फैल गई है। एक ओर जहां लूटकांड की गुत्थी सुलझ रही है, वहीं सुपारी देकर जनप्रतिनिधि की हत्या की साजिश सामने आने से राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क और इसके पीछे की पृष्ठभूमि की गहराई से जांच कर रही है। 

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क्रांतिकारी इतिहास की अनकही धाराओं को सामने लाती डॉ. लोकेश शरण की नई कृति


रायपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  राजधानी रायपुर के वृंदावन हॉल में सुप्रसिद्ध इतिहासकार, वरिष्ठ पत्रकार एवं शोधकर्ता डॉ. लोकेश कुमार शरण की पुस्तक "भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की क्रांतिकारी धाराएं" का विमोचन केवल एक औपचारिक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस पक्ष को पुनः सामने लाने का प्रयास था, जिसे लेखक और कई विद्वान अब तक उपेक्षित या आंशिक रूप से प्रस्तुत मानते हैं। श्लोक ध्वनि फाउंडेशन और अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह समारोह अपने उद्देश्य और वैचारिक संदेश दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण रहा।

इस पुस्तक की मूल प्रेरणा लेखक की उस जिज्ञासा और असंतोष में निहित है, जो उन्हें पाठ्यपुस्तकों में क्रांतिकारी आंदोलन की सीमित उपस्थिति देखकर हुआ। डॉ. लोकेश शरण का यह कथन कि "क्रांतिकारियों का इतिहास न तो पूरी तरह सामने आया है और न ही सही ढंग से प्रस्तुत किया गया है", केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं बल्कि इतिहास लेखन की एक व्यापक बहस को भी प्रतिबिंबित करता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को लंबे समय तक मुख्यतः अहिंसक संघर्ष के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया, जबकि सशस्त्र क्रांति और उग्र राष्ट्रवादी धाराओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण और प्रभावशाली रही। इस दृष्टि से यह पुस्तक इतिहास के बहुआयामी स्वरूप को सामने लाने का प्रयास करती है।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. पूर्णेंदु सक्सेना द्वारा "वंदे मातरम् से बड़ी तोप अंग्रेजों के पास नहीं थी" जैसा कथन इस बात का प्रतीक है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल भौतिक संघर्ष नहीं, बल्कि एक गहन सांस्कृतिक और भावनात्मक आंदोलन भी था। राष्ट्रगीत और प्रतीकों ने जनता के मन में जो चेतना और साहस पैदा किया, वह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध सबसे प्रभावी मनोवैज्ञानिक हथियार बना। यह पुस्तक भी उसी भावनात्मक और वैचारिक ऊर्जा को ऐतिहासिक तथ्यों के माध्यम से पुनः स्थापित करने का प्रयास करती प्रतीत होती है। 

अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. ए.डी.एन. वाजपेयी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अपने वक्तव्य में इस पुस्तक की वैचारिक और ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि "भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की क्रांतिकारी धाराएं" स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनेक स्थापित अनुमानों और पारंपरिक व्याख्याओं को चुनौती देने का साहसिक प्रयास करती है। उनके अनुसार यह कृति केवल घटनाओं का संकलन भर नहीं, बल्कि इतिहास की विभिन्न और अक्सर उपेक्षित धाराओं को एक सूत्र में पिरोने का गंभीर और शोधपरक प्रयास है।

उन्होंने कहा कि डॉ. लोकेश शरण ने इस पुस्तक के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन के बहुआयामी स्वरूप को सामने लाने का कार्य किया है, जिससे पाठकों को इतिहास की एक व्यापक और संतुलित समझ विकसित करने का अवसर मिलेगा। डॉ. वाजपेयी ने विश्वास व्यक्त किया कि यह कृति न केवल शोधार्थियों और इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी, बल्कि आम पाठकों के बीच भी इतिहास के प्रति नई जिज्ञासा और दृष्टि का संचार करेगी।

उन्होंने यह भी कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से डॉ. लोकेश शरण ने इतिहास लेखन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट पहचान बनाने की दिशा में सार्थक कदम बढ़ाया है, और भविष्य में वे देश के प्रमुख इतिहासकारों में अपना स्थान सुनिश्चित करेंगे।

पुस्तक की एक उल्लेखनीय विशेषता, जैसा कि विद्वानों ने रेखांकित किया, यह है कि इसमें इतिहासकार की तथ्यपरकता और पत्रकार की सहज भाषा का संयोजन है। डॉ. वंश गोपाल और शशांक शर्मा जैसे विद्वानों ने इस बात पर बल दिया कि यह कृति केवल शोधार्थियों तक सीमित नहीं, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से पठनीय है। चौरी-चौरा कांड जैसे प्रसंगों की तथ्यपरक और गहन प्रस्तुति इस पुस्तक के शोधपरक आधार को मजबूत बनाती है और यह दर्शाती है कि लेखक ने पारंपरिक व्याख्याओं से आगे बढ़कर नए दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

हालाँकि, इस प्रकार की कृतियों के संदर्भ में यह भी आवश्यक है कि पाठक और इतिहासकार दोनों एक संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखें। इतिहास का पुनर्पाठ और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देना एक स्वस्थ बौद्धिक प्रक्रिया है, लेकिन इसके लिए स्रोतों की प्रमाणिकता, वस्तुनिष्ठता और आलोचनात्मक दृष्टि भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि यह पुस्तक ठोस प्राथमिक स्रोतों और निष्पक्ष विश्लेषण पर आधारित है, तो यह निश्चित रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध हो सकती है।

समग्रतः, "भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की क्रांतिकारी धाराएं" का विमोचन केवल एक पुस्तक का प्रकाशन नहीं, बल्कि इतिहास के उस अध्याय को पुनः पढ़ने और समझने का आमंत्रण है, जो राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले अनगिनत क्रांतिकारियों की स्मृति से जुड़ा है। ऐसे प्रयास न केवल ऐतिहासिक चेतना को समृद्ध करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी में अपने अतीत के प्रति जिज्ञासा, सम्मान और समझ विकसित करने में भी सहायक होते हैं।

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सोनसरी-मुकुंदपुर सड़क स्वीकृति पर उप मुख्यमंत्री का आभार


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  उप मुख्यमंत्री अरुण साव से बिलासपुर के नेहरू चौक स्थित कार्यालय में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम में मस्तूरी के सोन ग्राम पंचायत के प्रतिनिधिमंडल ने सौजन्य भेंट की। प्रतिनिधिमंडल ने ग्राम में पूर्ण हुए एवं स्वीकृत विकास कार्यों के लोकार्पण तथा भूमिपूजन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए उन्हें औपचारिक निमंत्रण दिया। प्रतिनिधि मंडल ने बताया कि लगभग 19 लाख रुपये की लागत से नव निर्मित ग्राम पंचायत भवन का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है, जिसका शीघ्र ही लोकार्पण प्रस्तावित है। साथ ही सोनसरी से मुकुंदपुर तक साढ़े 8 किलोमीटर लंबाई की सड़क निर्माण कार्य के लिए लगभग 19 करोड़ रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति लोक निर्माण विभाग द्वारा जारी की गई है।

 इस महत्वपूर्ण स्वीकृति के लिए प्रतिनिधिमंडल ने उप मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। उप मुख्यमंत्री श्री साव ने आमंत्रण स्वीकार करते हुए कहा कि कार्यक्रम की तिथि शीघ्र निर्धारित की जाएगी और वे स्वयं उपस्थित होकर विकास कार्यों की शुरुआत करेंगे। उन्होंने क्षेत्र के समग्र विकास के लिए शासन की प्रतिबद्धता दोहराई। प्रतिनिधि मंडल में भाजपा ग्रामीण जिला अध्यक्ष मोहित जायसवाल, जिला पंचायत सदस्य राधा खिलावन पटेल, सोन सरपंच मोतीराम साहू सहित बजरंग पटेल, खिलावन श्रीवास, मनोज केवट, सीमा साहू आदि जनप्रतिनिधि एवं ग्रामीण जन उपस्थित थे।    

कैमरे की कलम: “नौकरी का विज्ञापन और ठगी का राष्ट्रनिर्माण”


बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक मुख्यालय में जय स्तम्भ पर लगा यह पोस्टर अपने आप में केवल एक “नौकरी का विज्ञापन” नहीं, बल्कि बेरोजगारी के बाजार में चल रहे उस संगठित भ्रम उद्योग का जीवंत उदाहरण है, जिसमें शब्द रोजगार के होते हैं और परिणाम अक्सर शोषण के। इस पोस्टर में बड़े अक्षरों में लिखा है—“नौकरी चाहिए, फोन घुमाइए”। यह वाक्य सुनने में जितना सरल और आकर्षक लगता है, उतना ही खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि जिस देश में लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, वहां अगर केवल “फोन घुमाने” से 18,500 से 21,500 रुपये महीने की नौकरी मिलने लगे, तो यह रोजगार कम और चमत्कार अधिक प्रतीत होता है। 

पोस्टर में दावा किया गया है कि कंपनी को “हेल्पर की जरूरत है”, पोस्टर में यह भी लिखा है कि “कंपनी की तरफ से रूम फ्री” और “आने-जाने के लिए गाड़ी फ्री” होगी। यह पढ़कर ऐसा लगता है कि कंपनी को कर्मचारी नहीं, दामाद चाहिए। यह सुविधाएं किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के पैकेज जैसी लगती हैं, लेकिन पोस्टर में कंपनी का नाम, उसका पंजीयन नंबर, लाइसेंस विवरण या कोई वैधानिक पहचान स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है। यह वही खामोशी है, जिसमें अक्सर धोखाधड़ी की आवाज छिपी होती है। इस पोस्टर में स्थानीय स्तर पर बिलासपुर (छत्तीसगढ़) का संपर्क नंबर दिया गया है, जबकि “डायरेक्टर” जिग्नेश भाई पटेल का नाम गुजरात के भरूच से जुड़ा बताया गया है। यह भौगोलिक दूरी और स्थानीय संपर्क का संयोजन ठगी के कई पुराने मामलों में देखा गया पैटर्न है जहां स्थानीय व्यक्ति केवल एक माध्यम होता है और वास्तविक संचालन कहीं और से होता है। 

दरअसल देश में बेरोजगारी अब केवल एक आंकड़ा नहीं रही, यह एक ऐसा खुला बाजार बन चुकी है, जहां नौकरी से ज्यादा नौकरी का भ्रम बिकता है। और इस भ्रम के सबसे बड़े कारोबारी वे लोग हैं, जो रोजगार नहीं देते, बल्कि रोजगार की कल्पना का प्राइवेट लिमिटेड संस्करण बेचते हैं। यह एक ऐसा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, जहां निवेश बेरोजगारों की उम्मीदें होती हैं और मुनाफा उनके आत्मसम्मान से वसूला जाता है। आज का ठग पुराना ठग नहीं रहा। वह अब जेबकतरा नहीं, बल्कि “डिजिटल एचआर मैनेजर” बन चुका है। वह अब स्टेशन पर खड़े होकर नहीं कहता—“चलो मुंबई, नौकरी दिलाएंगे।” अब वह लिंक्डइन पर प्रोफाइल बनाता है, इंस्टाग्राम पर विज्ञापन चलाता है और वाट्सऍप  पर “Congratulations” लिखकर बेरोजगार युवक को यह एहसास दिलाता है कि देश की अर्थव्यवस्था अब उसी के भरोसे चल रही है।

विडंबना यह है कि जिस देश में एक वास्तविक नौकरी पाने के लिए युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं में खप जाता है, उसी देश में एक फर्जी नौकरी देने वाला व्यक्ति मात्र एक सिम कार्ड और एक फर्जी लोगो से “मल्टीनेशनल कंपनी” बन जाता है। यह स्टार्टअप इंडिया का वह अंधेरा पक्ष है, जहां नवाचार का उपयोग रोजगार सृजन के लिए नहीं, बल्कि रोजगार भ्रम सृजन के लिए किया जा रहा है। 

इन ठगों की कार्यप्रणाली अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक है। वे जानते हैं कि बेरोजगार युवक को सबसे ज्यादा किस शब्द की भूख होती है—“Selected”। यह शब्द सुनते ही युवक की आंखों में वह चमक आ जाती है, जो वर्षों की असफलताओं ने बुझा दी थी। और यही वह क्षण होता है, जब ठग अपनी पहली किस्त वसूलता है—“रजिस्ट्रेशन फीस” के नाम पर। इसके बाद शुरू होता है शुल्कों का एक ऐसा सिलसिला, जो कभी समाप्त नहीं होता—ट्रेनिंग फीस, सिक्योरिटी फीस, प्रोसेसिंग फीस। यह फीस दरअसल नौकरी की नहीं, बल्कि ठगी की प्रक्रिया को वैधता देने का टैक्स होता है।

जब युवक पैसे दे देता है, तो उसे दूसरे राज्य भेज दिया जाता है। वहां उसका स्वागत किसी एयरपोर्ट मैनेजर के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे श्रमिक के रूप में होता है, जिसकी स्वतंत्रता पहले ही किस्त में गिरवी रखी जा चुकी होती है। वह समझ जाता है कि उसे नौकरी नहीं मिली, बल्कि उसे बेच दिया गया है—उसके श्रम को, उसकी मजबूरी को और उसके सपनों को।

यहां सबसे गंभीर प्रश्न ठगों की मौजूदगी नहीं, बल्कि उनकी निर्भीकता है। यह निर्भीकता उन्हें किसी अदृश्य शक्ति से नहीं, बल्कि व्यवस्था की सुस्ती से मिलती है। फर्जी विज्ञापन खुलेआम सोशल मीडिया पर चलते रहते हैं, हजारों लोगों तक पहुंचते हैं, लेकिन कार्रवाई का पहिया तब घूमता है, जब पीड़ित युवक थाने पहुंचकर अपनी मूर्खता का प्रमाण देने लगता है। व्यवस्था का रवैया भी कम व्यंग्यात्मक नहीं है। जब कोई युवक शिकायत करता है, तो उससे पूछा जाता है—“तुमने पैसे क्यों दिए?” यह प्रश्न दरअसल एक प्रशासनिक दर्शन को प्रकट करता है—कि अपराध से ज्यादा गंभीर गलती विश्वास करना है।

यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का भी प्रमाण है। क्योंकि ठग केवल पैसे नहीं चुराते, वे उस विश्वास को चुराते हैं, जिस पर समाज टिका होता है। वे केवल एक युवक को नहीं ठगते, बल्कि एक पूरे परिवार की आशाओं को दिवालिया घोषित कर देते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक संगठित और पेशेवर अगर कोई है, तो वह ठग है। उसके पास मार्केटिंग टीम है, फर्जी रिव्यू हैं, आकर्षक वेबसाइट है, और सबसे महत्वपूर्ण—उसे यह विश्वास है कि उसके खिलाफ कार्रवाई देर से ही होगी।

इसके विपरीत, पीड़ित युवक के पास केवल एक शिकायत होती है और एक लंबा इंतजार। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।क्योंकि जब अपराध तकनीकी रूप से आधुनिक हो जाए और कानून मानसिक रूप से परंपरागत बना रहे, तो न्याय हमेशा पीछे रह जाता है।

यह आवश्यक है कि व्यवस्था केवल अपराध होने के बाद सक्रिय न हो, बल्कि अपराध होने से पहले सतर्क हो। फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियों का सत्यापन, सोशल मीडिया विज्ञापनों की निगरानी और त्वरित कार्रवाई—ये केवल प्रशासनिक विकल्प नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व हैं। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में है और ठग बेरोजगार युवकों की तलाश में। 

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