कैमरे की कलम: 'सरकार के कंधे कमजोर, बहू की पीठ मजबूत'

“डिजिटल इंडिया” का सपना अब गांव-गांव तक पहुंच चुका है। सरकारी विज्ञापनों में बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान है, मोबाइल पर अंगूठा लगाते ही पेंशन खाते में आ जाती है, और ‘घर-पहुंच सेवा’ का दावा यह भरोसा देता है कि अब सरकार गरीब के दरवाजे तक उतर आई है लेकिन छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट से आई एक तस्वीर ने इन तमाम दावों की चमक को उतारकर धरती की धूल में पटक दिया है।

राज्य में सुशासन तिहार के बीच एक बहू अपनी 90 वर्षीय बूढ़ी सास को पीठ पर लादकर पाँच किलोमीटर पैदल चल रही है। रास्ते में नदी-नाले हैं, पथरीली चढ़ाइयां हैं, जंगल है, थकान है, बेबसी है। यह कोई तीर्थयात्रा नहीं थी, न किसी अस्पताल की आपात स्थिति। यह यात्रा सिर्फ 500 रुपये की वृद्धावस्था पेंशन के लिए थी। कल्पना कीजिए, जिस देश में करोड़ों रुपये के डिजिटल ट्रांजैक्शन सेकंडों में हो रहे हों, वहां एक वृद्ध महिला को अपने ही हक के पाँच सौ रुपये पाने के लिए इंसानी बोझ बन जाना पड़े — इससे बड़ा व्यंग्य लोकतंत्र पर और क्या होगा?

सरकार कहती है कि अब सबकुछ “ऑनलाइन” है। मगर सवाल यह है कि क्या इंसानियत भी ऑनलाइन हो चुकी है? क्या संवेदनाएं भी अब सर्वर से चलती हैं? और क्या गरीब की पीड़ा भी अब “केवाईसी अपडेट नहीं” के संदेश में बदल दी गई है? यह घटना सिर्फ एक परिवार की गरीबी नहीं दिखाती, बल्कि उस व्यवस्था का चेहरा उजागर करती है जो योजनाओं की फाइलों में बहुत दयालु दिखती है, लेकिन जमीन पर पहुंचते-पहुंचते पत्थर हो जाती है।

बहू सुखमनिया रोते हुए कहती है कि पहले बैंक मित्र घर आकर पैसे दे जाता था। फिर अचानक उसने आना बंद कर दिया। किसी ने कारण नहीं बताया। पेंशन रुक गई। केवाईसी का बहाना सामने आ गया। अब सोचिए, जंगलपारा जैसे दूरस्थ गांव में रहने वाली एक अशिक्षित महिला को कौन समझाएगा कि केवाईसी क्या होता है?
उसके लिए तो बैंक ही एक ऐसा भवन है, जहां जाने भर से डर लगता है। वहां की भाषा अलग, प्रक्रिया अलग, चेहरे अलग। वह केवल इतना जानती है कि सरकार ने बुजुर्गों के लिए कुछ पैसे तय किए हैं और वही पैसे अब नहीं मिल रहे।

व्यवस्था का सबसे क्रूर चेहरा यही होता है — जब वह अपनी असफलताओं को नियमों के पीछे छिपा देती है। बैंक प्रबंधन ने सफाई दी है कि “अगर सूचना दे दी जाती, तो बैंक मित्र घर पहुंच जाता।” वाह! यानी अब गरीब को यह भी पता होना चाहिए कि सुविधा मांगने की प्रक्रिया क्या है, जो महिला अपने गांव से बाहर की दुनिया नहीं जानती, उससे यह उम्मीद की जा रही है कि वह बैंकिंग नियमों की जानकारी रखे, आवेदन करे, सूचना दे, अनुरोध करे और फिर इंतजार करे। ये कड़वी सच्चाई है कि व्यवस्था ने गरीब को नागरिक नहीं, फाइल बना दिया है।

आज गांवों में सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, बल्कि “सूचना की गरीबी” है। योजनाएं हैं, लेकिन जानकारी नहीं। अधिकार हैं, लेकिन पहुंच नहीं। सरकारें मान बैठी हैं कि योजना घोषित कर देने भर से उसका लाभ लोगों तक पहुंच जाता है। असलियत यह है कि योजना और जरूरतमंद के बीच सबसे लंबा रास्ता “व्यवस्था” का होता है।

विडंबना देखिए, देश चांद पर पहुंच गया, लेकिन सरगुजा की एक बूढ़ी महिला अपने बैंक तक नहीं पहुंच पाई। सरकारी भाषणों में अक्सर कहा जाता है कि “अब कोई पीछे नहीं छूटेगा, लेकिन हकीकत यह है कि सबसे पहले वही लोग छूट जाते हैं, जिनके नाम पर योजनाएं बनती हैं — गरीब, आदिवासी, बुजुर्ग, विधवा और अशिक्षित।

दरअसल हमारी व्यवस्था में गरीब को सुविधा नहीं, प्रमाण देना पड़ता है। उसे हर बार साबित करना पड़ता है कि वह जिंदा है, गरीब है, पात्र है, और मदद के लायक है। कितनी विचित्र बात है कि 90 वर्षीय सोमारी बाई जो चलने-फिरने में असमर्थ है उसे यह साबित करने बैंक जाना पड़ रहा है कि वह अब भी जीवित है। मानो सरकार कह रही हो — “जब तक तुम खुद चलकर हमारे सामने नहीं आओगी, हमें यकीन नहीं होगा कि तुम्हें पेंशन चाहिए।” यह संवेदनहीनता केवल प्रशासनिक नहीं, नैतिक भी है।

आज गांवों में बैंक मित्र, पंचायत सचिव, पटवारी, राशन दुकानदार — यही सरकार का चेहरा हैं। लेकिन अक्सर यही चेहरे सबसे अधिक निराश करते हैं। क्योंकि व्यवस्था की निगरानी ऊपर से होती है, मगर पीड़ा नीचे पैदा होती है और नीचे पैदा हुई पीड़ा अक्सर ऊपर तक पहुंचती ही नहीं। यहां सवाल केवल एक बैंक मित्र की लापरवाही का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जिसमें गरीब की तकलीफ को “सामान्य” मान लिया गया है। अगर किसी महानगर में किसी बुजुर्ग को बैंक में लाइन में खड़ा होना पड़े, तो टीवी डिबेट शुरू हो जाती है। लेकिन जंगलपारा की एक महिला अपनी सास को पीठ पर ढोकर बैंक ले जाए, तो उसे “ग्रामीण कठिनाई” कहकर सामान्य बना दिया जाता है। गरीबी इस देश में अब संवेदना नहीं जगाती, वह सिर्फ आंकड़ा बनकर रह गई है।

सरकारें योजनाओं के नाम बदलने में तेज हैं। हर नई योजना के साथ नया नारा, नया लोगो, नया प्रचार आता है। लेकिन जिन लोगों के लिए ये योजनाएं बनाई जाती हैं, उनकी जिंदगी में कुछ नहीं बदलता। उनके हिस्से में वही टूटी सड़कें, वही अधूरी जानकारी, वही बंद दफ्तर और वही इंतजार आता है। सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरी घटना में किसी को अपराधबोध नहीं है।

बैंक कह रहा है — “हमें बताया नहीं गया।”  प्रशासन कहेगा — “मामला संज्ञान में आया है।” नेता कहेंगे — “जांच होगी।” और फिर कुछ दिनों बाद यह खबर किसी नई वायरल घटना के नीचे दब जाएगी लेकिन उस बूढ़ी महिला की पीठ का दर्द, उस बहू की थकान और उनकी बेबसी किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज नहीं होगी। हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि यहां गरीब की तकलीफ खबर बनती है, समाधान नहीं। अगर सचमुच सरकार “घर-पहुंच सेवा” देना चाहती है, तो उसे पहले यह समझना होगा कि सुविधा का मतलब केवल तकनीक नहीं होता।

एक बुजुर्ग महिला को पेंशन देने के लिए बैंक मित्र का घर तक जाना “कृपा” नहीं, उसकी जिम्मेदारी है और यदि वह जिम्मेदारी निभाई नहीं गई, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। आज जरूरत इस बात की नहीं है कि इस घटना पर दुख जताया जाए। जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था अपने भीतर झांके, क्योंकि यह सिर्फ सरगुजा की कहानी नहीं है। यह देश के हजारों गांवों की कहानी है, जहां योजनाएं कागज पर दौड़ती हैं और लोग पथरीले रास्तों पर।

हमें यह तय करना होगा कि “डिजिटल इंडिया” का मतलब क्या है। क्या यह सिर्फ शहरों के लिए तेज इंटरनेट है?
या फिर उस बुजुर्ग महिला तक सम्मानपूर्वक पेंशन पहुंचाना भी इसका हिस्सा है? किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके शहर कितने चमकदार हैं। उसकी पहचान इससे होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है। सरगुजा की यह तस्वीर हमें आईना दिखाती है। उस आईने में सरकार भी है, बैंक भी, प्रशासन भी और हम सब भी, क्योंकि हम सब धीरे-धीरे ऐसे समाज में बदलते जा रहे हैं, जहां गरीब की पीड़ा देखकर कुछ क्षण दुख तो होता है, लेकिन व्यवस्था बदलने की बेचैनी नहीं होती। शायद यही सबसे बड़ा खतरा है और अंत में, उस बहू की पीठ पर बैठी बूढ़ी सासू मां सिर्फ अपनी पेंशन लेने नहीं जा रही थी। वह इस देश की विकास यात्रा, सुशासन तिहार का सच ढो रही थी। एक ऐसा सच, जो बताता है कि सरकार अभी भी गरीब के घर तक नहीं पहुंची है। दावे कुछ भी हों लेकिन हकीकत ये है कि सरकार आज भी गरीब की पीठ पर लदी हुई चल रही है।

अयोध्या तीर्थ यात्रा के नाम पर 75 लोगों से ठगी, आरोपी गिरफ्तार


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रतनपुर थाना क्षेत्र में तीर्थ यात्रा कराने के नाम पर कथित ठगी का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार किया है।

पुलिस के मुताबिक आरोपी ने खुद को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति बताकर लोगों को अयोध्या दर्शन कराने का भरोसा दिलाया था। आरोप है कि उसने लगभग 75 लोगों से कुल 1 लाख 12 हजार 575 रुपये लिए, लेकिन न तो यात्रा कराई और न ही बाद में लोगों के संपर्क में रहा। गिरफ्तार आरोपी की पहचान होरीलाल अनंत उर्फ राज अनंत (32 वर्ष) निवासी झझपुरीकला, थाना लोरमी, जिला मुंगेली के रूप में हुई है।

पुलिस के अनुसार 22 मई 2026 को रतनपुर थाना क्षेत्र के गोंदईया निवासी हेमंत साहू ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि आरोपी ने करीब एक वर्ष पहले गोंदईया और बछालीखुर्द गांव के लोगों से अयोध्या यात्रा कराने के नाम पर पैसे लिए थे। बाद में आरोपी ने लोगों के फोन उठाने भी बंद कर दिए।

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद रतनपुर पुलिस ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर जांच शुरू की। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस टीम गठित की गई और आरोपी को कुछ ही घंटों के भीतर गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने आरोपी को न्यायिक रिमांड पर भेज दिया है। मामले की कार्रवाई में थाना प्रभारी अंशिका जैन और पुलिस टीम की भूमिका बताई गई है। 

करही हत्याकांड का खुलासा, पुलिस बोली- उधारी और रंजिश बनी हत्या की वजह


जांजगीर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के करही गांव में पिछले महीने हुए चर्चित गोलीकांड मामले में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ़्तार किया है। पुलिस का कहना है कि हत्या के पीछे आर्थिक विवाद, आपसी रंजिश और कारोबारी प्रतिस्पर्धा की वजह सामने आई है। 

पुलिस के मुताबिक 23 और 24 अप्रैल की दरम्यानी रात तीन नकाबपोश लोग गांव में रहने वाले आयुष कश्यप के घर में घुसे थे। आरोप है कि उन्होंने आयुष कश्यप पर कई राउंड फायरिंग की, जिससे उनकी मौके पर मौत हो गई। घटना में बीच-बचाव करने पहुंचे उनके छोटे भाई को भी गोली लगी थी, जिनका इलाज कराया गया।

जांजगीर-चांपा पुलिस ने इस मामले की जांच के लिए “ऑपरेशन हंट” नाम से विशेष अभियान चलाया था। पुलिस ने अब दावा किया है कि जांच के दौरान तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान हेमंत कुमार बघेल (23 वर्ष), भूषण बघेल (23 वर्ष), और अमित टंडन (28 वर्ष) निवासी करही के रूप में की गयी। पुलिस ने कहा है कि आरोपियों के पास से एक पिस्टल, मैगजीन, एक अतिरिक्त खाली मैगजीन और घटना में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल बरामद की गई है। 

मामले की जांच के दौरान पुलिस टीमों ने गुजरात, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर समेत सात राज्यों में दबिश दी। पुलिस के अनुसार जांच में 200 से अधिक सीसीटीवी फुटेज की पड़ताल की गई और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों तक पहुंचा गया।

घटना के बाद तत्कालीन प्रभारी पुलिस अधीक्षक निवेदिता पाल, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक उमेश कश्यप  और फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुंची थी। वहीं बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग ने भी गांव पहुंचकर जांच की समीक्षा की थी। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच अभी जारी है और आरोपियों से पूछताछ के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। 


जंगलों के बीच स्वास्थ्य की नई रोशनी, मोबाइल मेडिकल यूनिट बनी सहारा


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  / घने जंगलों और पहाड़ों से घिरे दूरस्थ जनजातीय गांवों में अब स्वास्थ्य सेवाओं की नई उम्मीद दिखाई देने लगी है। कभी मामूली बीमारी के इलाज के लिए भी कई किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर ग्रामीणों तक अब डॉक्टर और दवाइयां खुद पहुंच रही हैं। प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत संचालित मोबाइल मेडिकल यूनिट इन इलाकों में राहत और भरोसे का बड़ा माध्यम बनकर उभरी है।

विशेष रूप से पीवीटीजी समुदायों के लिए शुरू की गई यह पहल अब गांव-गांव तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचा रही है। आधुनिक उपकरणों से लैस मोबाइल मेडिकल यूनिट जैसे ही किसी दूरस्थ बस्ती में पहुंचती है, ग्रामीणों के चेहरों पर राहत साफ दिखाई देती है। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे अब बिना लंबी दूरी तय किए अपने गांव में ही डॉक्टर से जांच और उपचार प्राप्त कर रहे हैं।

राज्य में इस योजना की शुरुआत 31 दिसंबर 2025 को की गई थी। मार्च 2026 तक 3 हजार 103 लोगों का निःशुल्क उपचार किया जा चुका है। इन यूनिट्स के माध्यम से मरीजों की जांच, लैब टेस्ट और आवश्यक दवाइयों की सुविधा भी मुफ्त में उपलब्ध कराई जा रही है।

मोबाइल मेडिकल यूनिट अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है। इसमें ईसीजी मशीन, सक्शन मशीन, ऑटोस्कोप, ऑक्सीजन सिलेंडर और आपातकालीन स्ट्रेचर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। इससे अब ग्रामीणों को इलाज के लिए शहरों या स्वास्थ्य केंद्रों तक नहीं जाना पड़ रहा है।

दूरस्थ गांवों में रहने वाले बुजुर्गों का कहना है कि पहले इलाज के लिए पूरा दिन लग जाता था, लेकिन अब डॉक्टर खुद गांव पहुंच रहे हैं। गर्भवती महिलाओं और बच्चों को समय पर जांच और उपचार मिलने से ग्रामीणों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है।

स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने के लिए मोबाइल मेडिकल यूनिट हर महीने औसतन 24 दिन निर्धारित रोस्टर के अनुसार गांवों का भ्रमण करती हैं। जिले में फिलहाल तीन मोबाइल मेडिकल यूनिट संचालित हैं। प्रत्येक यूनिट में एक चिकित्सक, स्टाफ नर्स और लैब तकनीशियन तैनात किए गए हैं।

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 नवंबर 2023 को जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर पीएम-जनमन योजना की शुरुआत की थी। योजना का उद्देश्य दूरस्थ जनजातीय समुदायों तक शासन की मूलभूत सुविधाएं पहुंचाना है। स्वास्थ्य क्षेत्र में मोबाइल मेडिकल यूनिट इस उद्देश्य को जमीन पर साकार करती नजर आ रही हैं।

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