बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि बालिग हो जाने के बाद भी अविवाहित बेटी के प्रति पिता की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने मनेंद्रगढ़ फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए पिता की आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी।
मामला एमसीबी (मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर) जिले से संबंधित है। याचिकाकर्ता गोरखनाथ यादव ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी बेटी प्रिया यादव को प्रति माह पांच हजार रुपये भरण-पोषण राशि देने का निर्देश दिया गया था।
"पिता अपनी बालिग अविवाहित बेटी के भरण-पोषण की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।"
फैमिली कोर्ट ने वर्ष 2016 में बेटी के पक्ष में दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश पारित किया था। बाद में परिस्थितियों को देखते हुए दिसंबर 2023 में यह राशि बढ़ाकर पांच हजार रुपये कर दी गई थी। सुनवाई के दौरान पिता ने तर्क दिया कि बेटी अब बालिग हो चुकी है और उसकी मां के पास पर्याप्त कृषि भूमि व आय के साधन मौजूद हैं। साथ ही उन्होंने बेटी की वैधता और पारिवारिक संबंधों को लेकर भी सवाल उठाए। वहीं बेटी की ओर से कहा गया कि वह अविवाहित है और उसे भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त है। अदालत को यह भी बताया गया कि वर्ष 2016 से लगातार भरण-पोषण दिया जा रहा है और उस आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई थी।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि जब वर्षों से भरण-पोषण संबंधी आदेश प्रभावी है, तब अब रिश्ते की वैधता पर सवाल उठाना उचित नहीं है। अदालत ने माना कि पिता की कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी संतान के भरण-पोषण की व्यवस्था करे।
कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पिता की याचिका खारिज कर दी और बेटी को प्रति माह पांच हजार रुपये भरण-पोषण राशि देने का आदेश बरकरार रखा।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि बालिग हो जाने के बाद भी अविवाहित बेटी के प्रति पिता की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने मनेंद्रगढ़ फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए पिता की आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी।
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