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माहुल: एक वृक्ष का संकट; आजीविका, पर्यावरण और परंपरा—तीनों पर खतरा

IUCN ने रेड डेटा बुक में ‘अत्यंत संकटग्रस्त’ श्रेणी में रखा


बिलासपुर।
  TODAY छत्तीसगढ़  /  छत्तीसगढ़ के जंगलों में जीवन और आजीविका का आधार रहे ‘माहुल’ वृक्ष पर अब अस्तित्व का संकट गहरा गया है। अंतरराष्ट्रीय संस्था IUCN ने इसे अपनी रेड डेटा बुक में सर्वाधिक संकटग्रस्त (Critically Endangered) प्रजाति के रूप में दर्ज किया है। यह खुलासा न केवल पर्यावरणविदों, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है, जिनकी रोजी-रोटी इस वृक्ष पर निर्भर है। 

वन अनुसंधानों में सामने आया है कि पौधरोपण के प्रति अनिच्छा, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, संरक्षण की अनदेखी और इसके बीजों का समुचित उपयोग न होना जैसे कारणों से माहुल तेजी से विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया है। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ‘माहुल परिवार’ का प्रमुख वृक्ष पलाश पहले ही इसी तरह के संकट से गुजर रहा है। 

माहुल की पत्तियां ग्रामीण और आदिवासी अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। दोना-पत्तल निर्माण, छप्पर और घरेलू उपयोग, बीजों से औषधि निर्माण और जड़ों से पारंपरिक दवाइयां बनाई जाती रही हैं। ग्रामीण जनजीवन और कुछ शहरी क्षेत्र के हजारों परिवारों का जीवनयापन 'माहुल' से जुड़ा हुआ है।

सबसे आश्चर्य और हैरत की बात यह है कि यह हर जमीन पर उगने वाला ‘जीवन वृक्ष’ है। माहुल की खासियत यह है कि यह लगभग हर प्रकार की भूमि में उग सकता है जिसकी ऊंचाई 10–30 मीटर तक हो सकती है । यह वृक्ष मिट्टी के कटाव को रोकता है साथ ही पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखता है। इसके अलावा बेल और वृक्ष की छाल से रस्सी, तने से टोकरी व चटाई और पत्तियों से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार किए जाते हैं। ऐसे में यह सिर्फ एक पेड़ का संकट नहीं है बल्कि यह उस पूरी जीवन-श्रृंखला का संकट है, जो इससे जुड़ी हुई है। 


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