अवैध शराब परिवहन करते 3 आरोपी गिरफ्तार


राजनांदगांव (डोंगरगढ़)। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  अवैध शराब के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत डोंगरगढ़ पुलिस ने एक बार फिर बड़ी सफलता हासिल करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने दो अलग-अलग मामलों में कुल 14.760 बल्क लीटर देशी शराब और दो मोटरसाइकिल जब्त की हैं।

पहले मामले में 25 अप्रैल को मुखबिर की सूचना पर ग्राम मुरमुंदा पेट्रोल पंप के पास घेराबंदी कर आरोपी खिलेश निर्मलकर (24 वर्ष), निवासी रंगाखार को मोटरसाइकिल (CG 08 NB 2848) में शराब परिवहन करते पकड़ा गया। पुलिस की तलाशी में आरोपी के पास से 34 पाव देशी प्लेन शराब (6.120 बल्क लीटर) जिसकी कीमत: ₹2,720 बताई जा रही है। 

इसी तरह दूसरे मामले में पुलिस ने ग्राम गाजमर्रा और राजकट्टा के बीच तालाब के पास कार्रवाई कर आशीष कुमार सिन्हा (22 वर्ष) और नरसिंह सिन्हा (40 वर्ष) को मोटरसाइकिल (CG 08 AN 7715) के साथ गिरफ्तार किया। इनके पास से 48 पाव देशी प्लेन शराब (8.640 बल्क लीटर) जब्त की गई।  दोनों मामलों में आरोपियों के खिलाफ धारा 34(2) आबकारी अधिनियम के तहत अपराध दर्ज कर उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया। 

आरोपी खिलेश निर्मलकर

साव ने श्रीनगर में छत्तीसगढ़ की खेल योजनाओं एवं भविष्य की रणनीतियों को किया साझा


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  केन्द्रीय युवा कार्य और खेल मंत्रालय द्वारा श्रीनगर में आयोजित खेल चिंतन शिविर के दूसरे दिन आज उप मुख्यमंत्री तथा खेल एवं युवा कल्याण मंत्री श्री अरुण साव ने 'गुड गवर्नेंस इन स्पोर्ट्स' (Good Governance in Sports) पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता की। उन्होंने इस दौरान छत्तीसगढ़ की खेल योजनाओं एवं भविष्य की रणनीतियों पर बेस्ट प्रेक्टिसेस पर आधारित वीडियो प्रेजेंटेशन भी दिया। श्री साव ने विभिन्न राज्यों से आए खेल मंत्रियों एवं अधिकारियों के समक्ष छत्तीसगढ़ में खेलों और खिलाड़ियों के विकास के लिए लागू बेस्ट गवर्नेंस प्रेक्टिसेस (Best Governance Practices) को विस्तार से साझा किया। उन्होंने विभिन्न राज्यों से सुझाव भी प्राप्त किए। चिंतन शिविर में शामिल अलग-अलग राज्यों के प्रतिनिधियों ने छत्तीसगढ़ की भावी योजनाओं की सराहना करते हुए इसे एक प्रभावी मॉडल बताया।

उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव ने राष्ट्रीय खेल चिंतन शिविर के दौरान दो दिनों तक विभिन्न राज्यों के खेल मंत्रियों एवं अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से संवाद कर महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की। उन्होंने खेलों को बढ़ावा देने की अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता को दोहराते हुए छत्तीसगढ़ में बेहतर खेल अवसंरचना, प्रतिभा संवर्धन एवं खिलाड़ियों को अधिक अवसर प्रदान करने पर जोर दिया। 

श्री साव ने कहा कि प्रतिभा, पारदर्शिता और अवसर से ही भारत वैश्विक खेल शक्ति बनेगा। मजबूत खेल व्यवस्था और प्रोत्साहन से ही देश को ओलंपिक खेलों में बड़ी सफलता मिलेगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह चिंतन शिविर छत्तीसगढ़ और पूरे देश में खेलों के समग्र विकास, सुदृढ़ खेल व्यवस्था के निर्माण तथा खिलाड़ियों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए नई दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

चिंतन शिविर के दूसरे दिन भी आज अलग-अलग सत्रों में खेल प्रशासन, नीतिगत सुधार एवं युवा मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा की गई। इस दौरान राज्यों में खेल सामग्रियों के निर्माण, सरकारी योजनाओं तथा स्पोर्ट्स स्टार्ट-अप्स (Sports Startups) को बढ़ावा देने पर चर्चा की गई। इसमें यह बात प्रमुखता से आई कि भारत में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल उपकरणों का निर्माण किया जाए, जिससे देश का खेल उद्योग आत्मनिर्भर बन सके।

आज एक महत्वपूर्ण सत्र में सलेक्शन पॉलिसी और एज फ्रॉड (Selection Policy & Age Fraud) पर भी विशेष चर्चा हुई। इसमें खिलाड़ियों के चयन में पारदर्शिता, निष्पक्षता एवं स्पष्ट मापदंड सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। साथ ही उम्र में गड़बड़ी (Age Fraud) की रोकथाम के लिए सख्त सत्यापन प्रक्रिया एवं तकनीकी उपाय अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया, ताकि खेलों में ईमानदारी एवं विश्वसनीयता बनी रहे।

आज का अंतिम सत्र 'माई भारत' (MY Bharat) की योजनाओं और इसकी कार्ययोजना (Action Plan) पर केंद्रित रहा। इसमें खेलों के साथ-साथ युवा मामलों को भी समान महत्व देते हुए केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला गया। साथ ही योजनाओं के प्रभावी प्रचार-प्रसार पर जोर दिया गया, ताकि अधिक से अधिक युवाओं तक इनका लाभ पहुंच सके। 

चिंतन शिविर के समापन के दौरान केन्द्रीय युवा कार्य और खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने घोषणा की कि जल्दी ही केवल युवा मामलों पर केंद्रित एक विशेष चिंतन शिविर का आयोजन किया जाएगा। दो दिवसीय चिंतन शिविर में देश के दिग्गज खिलाड़ी ओलंपियन श्री अभिनव बिंद्रा, श्री पुलेला गोपीचंद और श्री गगन नारंग सहित खेल प्रशासक और नीति निर्माता भी बड़ी संख्या में शामिल हुए।

ऐतिहसिक नगरी मल्हार में 2000 वर्ष पुराना ताम्रपत्र मिला, इतिहास की अनमोल धरोहर उजागर


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  ज्ञान भारतम अभियान के तहत ऐतिहासिक नगर मल्हार में एक  महत्वपूर्ण खोज सामने आई है। यहाँ रहने वाले श्री संजीव पाण्डेय के निवास पर 3 किलोग्राम से अधिक वजन का एक दुर्लभ ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है, जिस पर लगभग 2000 वर्ष पुरानी ब्राह्मी लिपि तथा पाली भाषा में लेख उत्कीर्ण हैं। यह ताम्रपत्र ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 

      ब्राह्मी लिपि भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक है, जिसका उपयोग मौर्य काल से प्रारंभ होकर कई शताब्दियों तक होता रहा। वहीं पाली भाषा का संबंध मुख्यतः बौद्ध धर्म के साहित्य और शिक्षाओं से जुड़ा रहा है, जिससे इस खोज का धार्मिक महत्व भी बढ़ जाता है।

   विशेषज्ञों के अनुसार, प्राचीन समय में ऐसे ताम्रपत्रों का उपयोग भूमि दान, राजकीय आदेश या धार्मिक घोषणाओं के आधिकारिक दस्तावेज के रूप में किया जाता था। इस ताम्रपत्र का वैज्ञानिक परीक्षण एवं विस्तृत अध्ययन किए जाने पर उस काल की सामाजिक संरचना, प्रशासनिक व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है। ज्ञान भारतम अभियान के तहत यह खोज न केवल मल्हार क्षेत्र की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को उजागर करती है, बल्कि शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है।

     उल्लेखनीय है कि संस्कृति  मंत्रालय द्वारा ज्ञान भारतम् अभियान के तहत देश की प्राचीन और दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। संस्कृति मंत्रालय के मार्गदर्शन में यह पहल गांव-गांव तक पहुंच रही है, जहां ग्राम सभाओं के माध्यम से लोगों को अपनी पुरानी पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने और उन्हें सामने लाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा और दर्शन से जुड़े अमूल्य दस्तावेजों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण करना है। विशेषज्ञों द्वारा पांडुलिपियों की पहचान कर उनका डिजिटलीकरण किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस विरासत को सुरक्षित रखा जा सके। यह अभियान न केवल सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि देश की ऐतिहासिक और बौद्धिक संपदा को पुनर्जीवित करने का भी एक सशक्त प्रयास है।

कैमरे की कलम: गुमनामी के साये में सुबह का सिपाही


सुबह की पहली किरण जब क्षितिज पर दस्तक देती है, तब शहर अब भी आधी नींद में होता है। कहीं चाय चढ़ रही होती है, कहीं अलार्म बजने की तैयारी में होता है, और कहीं लोग अभी सपनों में खोए रहते हैं। लेकिन इसी अधजगी दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनका दिन बहुत पहले शुरू हो चुका होता है। ये वे लोग हैं, जो हमारे दरवाजे तक हर सुबह अखबार पहुँचाते हैं—अखबार हॉकर।

हमारे लिए अखबार महज़ खबरों का पुलिंदा हो सकता है, लेकिन उनके लिए यह रोज़ी-रोटी का जरिया है, जीवन का संघर्ष है और जिम्मेदारी का एक ऐसा बोझ है, जिसे वे बिना किसी शोर-शराबे के ढोते रहते हैं। जब शहर सो रहा होता है, तब हॉकर जाग चुके होते हैं। सुबह के तीन या चार बजे का समय—जब ठंड हड्डियों तक चुभती है या गर्मी की रात अभी ढली नहीं होती—वे अपने दिन की शुरुआत करते हैं। नींद अधूरी होती है, शरीर थका हुआ होता है, लेकिन जिम्मेदारियाँ उन्हें आगे बढ़ने को मजबूर करती हैं।

अखबार एजेंसी तक पहुँचना, बंडल उठाना, उन्हें अलग-अलग मोहल्लों के हिसाब से बांटना—यह सब काम इतनी तेजी और सटीकता से होता है कि मानो यह कोई अभ्यास किया हुआ युद्ध हो। हर अखबार सही घर तक पहुँचना चाहिए, हर ग्राहक की अपेक्षा पूरी होनी चाहिए। एक छोटी सी चूक भी शिकायत में बदल सकती है। हॉकर का सबसे बड़ा दुश्मन समय होता है। उन्हें हर हाल में सूरज निकलने से पहले अपना काम पूरा करना होता है। साइकिल, मोटरसाइकिल या कभी-कभी पैदल—वे गलियों, सड़कों और मोहल्लों में दौड़ते रहते हैं। बारिश हो तो अखबार बचाना भी चुनौती बन जाता है। हवा तेज हो तो पन्ने उड़ने का डर रहता है। ठंड में उंगलियां सुन्न हो जाती हैं और गर्मी में पसीना आँखों में चुभता है। लेकिन इन सबके बावजूद, उनके काम की रफ्तार कभी धीमी नहीं पड़ती।

यह विडंबना ही है कि जो व्यक्ति हर सुबह हमें देश-दुनिया की खबरों से जोड़ता है, उसकी अपनी आर्थिक स्थिति अक्सर कमजोर होती है। अखबार बांटने के बदले उन्हें बहुत कम पैसा मिलता है—इतना कि उससे गुजारा करना भी मुश्किल हो जाता है। अक्सर यह काम वे किसी और नौकरी के साथ करते हैं, या फिर उनके परिवार के अन्य सदस्य भी किसी छोटे-मोटे काम में लगे होते हैं। कई बार बच्चों की पढ़ाई भी इसी संघर्ष में पीछे छूट जाती है।

समाज में हर काम का एक महत्व होता है, लेकिन हर काम को समान सम्मान नहीं मिलता। हॉकर का काम भी ऐसा ही है—जरूरी तो है, लेकिन सम्मान के मामले में पीछे छूट जाता है। हम अक्सर दरवाजा खोलते ही अखबार उठा लेते हैं, बिना यह सोचे कि उसे वहाँ तक पहुँचाने में कितनी मेहनत लगी होगी। कभी-कभी शिकायतें भी कर देते हैं—अखबार देर से आया, गीला था या सही जगह नहीं रखा गया। लेकिन क्या हम कभी उनके हालात समझने की कोशिश करते हैं?

अखबार हॉकर सिर्फ अखबार नहीं बाँटते, वे विश्वास भी बाँटते हैं। हर घर उनसे एक तय समय पर अखबार की उम्मीद करता है। यह भरोसा उनके कंधों पर एक अदृश्य जिम्मेदारी की तरह होता है। कई बार वे बीमार होते हुए भी काम पर निकलते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अगर वे नहीं गए, तो कई घरों में सुबह अधूरी रह जाएगी। यह सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक आदत और एक भरोसा है, जिसे वे निभाते हैं।

आज के डिजिटल युग में, जब खबरें मोबाइल स्क्रीन पर पल भर में उपलब्ध हो जाती हैं, अखबार हॉकर का काम और भी कठिन हो गया है। लोगों ने अखबार पढ़ना कम कर दिया है, जिससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ा है। लेकिन इसके बावजूद, वे हार नहीं मानते। वे जानते हैं कि अभी भी बहुत से लोग सुबह की चाय के साथ कागज़ की खुशबू और छपी हुई खबरों का आनंद लेना पसंद करते हैं।

अगर हम गहराई से सोचें, तो हॉकर समाज को जोड़ने में एक अहम भूमिका निभाते हैं। वे हर दिन लाखों लोगों तक जानकारी पहुँचाते हैं, जागरूकता फैलाते हैं और लोकतंत्र की नींव को मजबूत करते हैं। उनका काम भले ही छोटा लगे, लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। वे उस सूचना श्रृंखला की पहली कड़ी हैं, जिसके बिना खबरें लोगों तक नहीं पहुँच सकतीं।

इन सबके बीच, हॉकर भी इंसान हैं—उनके भी सपने हैं, इच्छाएँ हैं और परेशानियाँ हैं। कोई अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, कोई अपने घर की हालत सुधारना चाहता है, तो कोई सिर्फ एक स्थिर जीवन की उम्मीद करता है लेकिन अक्सर ये सपने जिम्मेदारियों और संघर्षों के बोझ तले दब जाते हैं। यह जरूरी है कि हम इन गुमनाम नायकों को पहचानें और उनके प्रति संवेदनशील बनें। एक छोटी सी मुस्कान, एक धन्यवाद, या उनके काम की सराहना—यह सब उनके लिए बहुत मायने रखता है। सरकार और समाज को भी उनके लिए बेहतर योजनाएँ बनानी चाहिए—जैसे बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और उचित वेतन। क्योंकि जब तक उनके जीवन में सुधार नहीं होगा, तब तक इस व्यवस्था की नींव कमजोर ही रहेगी।



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