कैमरे की कलम: शोर का लोकतंत्र और आस्था की राजनीति


आज का भारत बहसों से नहीं, शोर से चल रहा है। यह शोर टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक फैला है। हर मुद्दा तात्कालिक है, हर गुस्सा प्रायोजित, और हर बहस अधूरी। धर्म, जाति और पहचान ये अब सामाजिक विमर्श नहीं रहे, ये राजनीतिक औज़ार बन चुके हैं। जिस दिन कोई मुद्दा जनसरोकार के सवालों की ओर बढ़ने लगता है, उसी दिन नया शोर पैदा कर दिया जाता है। समाज, धर्म और जाति जो कभी पहचान और सह-अस्तित्व के आधार थे अब टकराव की रेखाओं में बदलते दिख रहे हैं। भीड़ के शोर में व्यक्ति की आवाज़ गुम होती जा रही है। हर मुद्दा दो ध्रुवों में बँट जाता है समर्थन या विरोध, बीच की विवेकपूर्ण आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं बचती। यह हालात लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं, क्योंकि लोकतंत्र बहस से मजबूत होता है, उन्माद से नहीं।

पिछले एक सप्ताह से देश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े मुद्दों पर गरमाई बहस यह दिखाती है कि आज आस्था भी राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। कोई समर्थन में खड़ा है, कोई विरोध में। लेकिन बहुत कम लोग सवाल पूछने की जगह बचा पा रहे हैं। धर्म जब संवाद के बजाय दमन का माध्यम बन जाए, तो समस्या धर्म में नहीं उसके राजनीतिक इस्तेमाल में होती है। यह विवाद असल में इस बात का प्रतीक है कि हम असहमति को अपमान समझने लगे हैं। जैसा कि सभी जानते हैं प्रयागराज में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच टकराव देखने को मिला। इस दौरान शंकराचार्य के स्नान कार्यक्रम और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन और उनके समर्थकों के बीच मतभेद सामने आए। मौनी अमावस्या के दिन मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया। प्रशासन का कहना था कि सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन को देखते हुए विशेष व्यवस्था लागू की गई थी। वहीं शंकराचार्य समर्थकों ने इसे परंपराओं का अपमान बताया। स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की खबरें सामने आईं। इसके बाद शंकराचार्य ने मेला और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ धरना शुरू कर दिया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ प्रयागराज बल्कि देशभर में ध्यान खींचा और सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सार्वजनिक विवादों में आए हों। इससे पहले भी उनके कई बयान और हस्तक्षेप चर्चा और विवाद का कारण बन चुके हैं।

वैसे भी भारत में विवाद कोई नई चीज़ नहीं है। यहाँ विवाद जन्म लेते हैं, पलते हैं, मीडिया में जवान होते हैं और फिर किसी अगले विवाद की आहट में खो जाते हैं। लेकिन कुछ विवाद ऐसे होते हैं जो सिर्फ किसी व्यक्ति या बयान तक सीमित नहीं रहते वे समाज के भीतर चल रहे गहरे अंतर्विरोधों को उजागर कर देते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर देशभर में जो बहस चल रही है, वह भी ऐसा ही एक मामला है। कोई उनके शंकराचार्य होने पर सवाल खड़े करता है, कोई उनके अहंकारी तेवर का हवाला देकर गलत ठहराता है। ऐसा लगता है यह विवाद किसी एक बयान का नहीं, बल्कि उस भूमिका का है जो एक धार्मिक पदाधिकारी आज के भारत में निभा रहा है या निभाना चाहता है। 

भारतीय परंपरा में शंकराचार्य केवल एक धार्मिक गुरु नहीं होता। वह विचार की परंपरा का वाहक होता है संयम, विवेक और तटस्थता का प्रतीक। ऐसे में जब कोई शंकराचार्य बार-बार समकालीन राजनीति, सरकार, नीतियों या सामाजिक समूहों पर तीखे वक्तव्य देता है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्या यह आध्यात्मिक मार्गदर्शन है या वैचारिक हस्तक्षेप ? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया वक्तव्यों ने यही प्रश्न फिर से केंद्र में ला दिया है। कभी गाय, कभी संविधान, कभी राष्ट्रवाद, कभी सरकार, विषयों की सूची लंबी है। समस्या यह नहीं कि वे बोल रहे हैं; समस्या यह है कि वे किस स्वर, किस भाषा और किस उद्देश्य से बोल रहे हैं। सदियों से व्यंग्य और कटाक्ष भारतीय बौद्धिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। कबीर ने भी किया, तुलसी ने भी संकेत दिए। लेकिन वहाँ व्यंग्य आत्ममंथन के लिए था, न कि तालियाँ बटोरने के लिए। आज जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कोई बयान आता है, तो वह टीवी बहसों की हेडलाइन बनता है, सोशल मीडिया के ट्रेंड में बदल जाता है और फिर राजनीतिक खेमों में बाँट दिया जाता है। एक पक्ष उन्हें “सच्चा धर्मरक्षक” बताता है, दूसरा “राजनीतिक एजेंडा चलाने वाला साधु”। यह विभाजन बताता है कि उनका वक्तव्य अब आध्यात्मिक संवाद नहीं रह गया, वह राजनीतिक हथियार बन चुका है। 

यहाँ एक असहज प्रश्न खड़ा होता है, क्या एक साधु की भाषा उतनी ही कठोर हो सकती है जितनी एक राजनीतिक नेता की? जब धर्माचार्य सरकार पर सीधा हमला करते हैं, तो एक वर्ग इसे “साहस” कहता है। लेकिन जब वही धर्माचार्य किसी विशेष सामाजिक या वैचारिक समूह के प्रति कठोर रुख अपनाते हैं, तो वही वर्ग “धर्म की रक्षा” का तर्क देता है। यह दोहरा मापदंड ही विवाद की असली जड़ है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के कुछ वक्तव्यों में यह स्पष्ट दिखता है कि वे खुद को नैतिक सत्ता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। एक ऐसी सत्ता जो चुनी नहीं गई, लेकिन जो चुनी हुई सत्ता को चुनौती देती है। 

आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की चर्चा केवल इसलिए भी नहीं है कि वे एक शंकराचार्य हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे उस बदलती भूमिका का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें धर्माचार्य आध्यात्मिक मार्गदर्शन से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में सक्रिय दिखाई देते हैं। यह भूमिका भारतीय लोकतंत्र और समाज, दोनों के लिए नए सवाल खड़े करती है। क्या धर्माचार्यों की यह सक्रियता समय की मांग है, या इससे धार्मिक पदों की तटस्थता प्रभावित होती है यह बहस अभी जारी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आज के भारत में धर्म, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के संगम पर खड़े एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी हर टिप्पणी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अर्थ भी ग्रहण कर लेती है। 

इस पूरे विवाद में मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। हर बयान को ब्रेकिंग न्यूज़, हर कटाक्ष को राष्ट्रीय बहस और हर प्रतिक्रिया को टकराव बना दिया गया। टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर पूछते हैं— “क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती देश की आवाज़ हैं?” “क्या वे राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे हैं?” लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि क्या हम धर्माचार्यों को इस भूमिका में धकेल रहे हैं, क्योंकि हमें शोर चाहिए, समाधान नहीं? 


बंजर में जीवन की आहट: मोहनभाठा में इंडियन कोर्सर की वापसी


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  कभी-कभी धरती बहुत धीमी आवाज़ में बोलती है। इतनी धीमी कि अगर सुनने का धैर्य न हो, तो वह आवाज़ खो जाती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का मोहनभाठा भी ऐसी ही एक आवाज़ है सूखी, बंजर और उपेक्षित, लेकिन भीतर ही भीतर जीवन से भरी हुई। सवा साल के लंबे इंतज़ार के बाद 18 जनवरी को जब यहाँ एक बार फिर इंडियन कोर्सर (Indian Courser) दिखाई पड़ा, तो लगा जैसे इस ज़मीन ने खुद कहा हो 'मैं अब भी ज़िंदा हूँ।' 

"वह आता है, दौड़ता है और बिना कोई निशान छोड़े ओझल हो जाता है। लेकिन उसकी मौजूदगी बहुत कुछ कह जाती है।"

तेज़ चाल, सतर्क स्वभाव और खुले, शुष्क मैदानों से गहरे रिश्ते वाला यह दुर्लभ परिंदा कल शाम जब मोहनभाठा में अपनी ज़मीन तलाशता दिखाई देता है, तो यह महज़ एक पक्षी का दिखना नहीं बल्कि एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के जीवित होने का संकेत होता है। कल तीन कौरसरों का मोहनभाठा में दिखना इस बात का प्रमाण है कि तमाम दबावों के बावजूद यह मैदान अब भी उन्हें बुला रहा है। मध्यम आकार का, पतले शरीर और लंबी टाँगों वाला इंडियन कोर्सर (Indian Courser) उड़ने से ज़्यादा दौड़कर चलता है। 

"उन तस्वीरों में सिर्फ़ अंडे नहीं थे वे भरोसे की निशानी थीं। भरोसा कि यह ज़मीन सुरक्षित है, भरोसा कि यहीं अगली पीढ़ी जन्म ले सकती है।"

इन ख़ास पक्षियों को लेकर सबसे चौकाने वाली बात करीब दो बरस पहले सामने आई। बिलासपुर के दो नामचीन पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफर संदीपन अधिकारी, राधाकिशन शर्मा ने इंडियन कोर्सर (Indian Courser) के अंडे की तस्वीरें दर्ज कीं। यह महज़ फ़ोटोग्राफ़ी नहीं थी यह ठोस प्रमाण था कि मोहनभाठा की बंजर भूमि उन्हें केवल भाती ही नहीं, बल्कि यहीं वे अपनी अगली पीढ़ी को भी बढ़ा रहे हैं। कुछ फ़ोटोग्राफ़रों के पास इनके चूजों की तस्वीरें होना इस विश्वास को और मज़बूत करता है कि यह मैदान एक सक्रिय प्रजनन स्थल है।

मोहनभाठा की पहचान उसकी जैव-विविधता है। यहाँ शेड्यूल–I से लेकर IV तक के पक्षी, जीव-जंतु और वन्यप्राणी समय-समय पर दिखाई देते हैं। बारिश के मौसम में यह क्षेत्र कई दुर्लभ प्रजाति के प्रवासी पक्षियों के ठहराव का बड़ा केंद्र बन जाता है। सबसे संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल इजिप्शन वल्चर का हर साल परिवार के साथ यहां दिखाई देना बताता है कि आसपास कहीं उनका रहवास मौजूद है। ऐसे संकेत किसी भी इलाके के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का पैमाना होते हैं। 

इंडियन कोर्सर की वापसी हमें खुश करती है, लेकिन साथ ही सवाल भी पूछती है क्या यह ज़मीन आने वाले वर्षों में भी उसे स्वीकार कर पाएगी ? इंडियन कोर्सर जैसे पक्षी संकेतक होते हैं। वे बताते हैं कि प्रकृति अब भी हमें एक मौका दे रही है। 

लेकिन यही समृद्धि आज खतरे में है। मोहनभाठा जो कभी पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान था अब अवैध भूमि अधिग्रहण, शिकारियों की बेख़ौफ़ आवाजाही, मुरूम के अवैध उत्खनन, पेड़ों की कटाई और असामाजिक तत्वों की पनाहगाह बनता जा रहा है। प्रशासनिक उदासीनता और जिम्मेदार विभागों की अनदेखी ने इस चारागाह को सिमटने की कगार पर ला खड़ा किया है।

इंडियन कोर्सर की वापसी जितनी सुखद है, उतनी ही चेतावनी भी। यह बताती है कि अगर संरक्षण की ठोस पहल नहीं हुई, तो यह जीवन-रेखा टूट सकती है। घास भूमियाँ अक्सर “बंजर” कहकर नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं, जबकि यही मैदान दुर्लभ प्रजातियों का आधार होते हैं। कौरसर जैसे संकेतक पक्षी हमें बताते हैं कि प्रकृति कहाँ तक सहन कर सकती है और कहाँ नहीं। 

मोहनभाठा के संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

मोहनभाठा को बचाना केवल एक मैदान को बचाना नहीं, बल्कि उस विरासत को संभालना है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का सबक बन सकती है। जब तक इंडियन कोर्सर (Indian Courser) जैसे पक्षी यहाँ दौड़ते रहेंगें, तब तक यह धरती ज़िंदा है। इसके संरक्षण की मुहिम जारी रहनी चाहिए क्योंकि मैदान बचेंगे, तभी परिंदे लौटेंगे; और परिंदे लौटेंगे, तभी उम्मीदें जिंदा रहेंगी।

कैमरे की कलम: चूहे, दीमक और सात करोड़ की लोकतांत्रिक भूख


छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में जो हुआ, वह घोटाला नहीं घोटाले का सरकारी विज्ञापन है। फर्क बस इतना है कि इस बार पोस्टर पर नेता नहीं, चूहे मुस्कुरा रहे हैं। 26 हजार क्विंटल धान, सात करोड़ रुपये और जवाब चूहा, दीमक, मौसम। यानी चोरी भी प्रकृति ने की, गिनती भी प्रकृति ने बिगाड़ी और जवाबदेही भी प्रकृति ले जाएगी। यह घटना उस व्यवस्था का चरित्र प्रमाणपत्र है, जो हर बड़े घोटाले के बाद और ज्यादा बेशर्म, ज्यादा आत्मविश्वासी और ज्यादा रचनात्मक होती जा रही है। सात करोड़ रुपये का धान न आग में जला, न बाढ़ में बहा, न ही किसी युद्ध में लुटा बस चूहों, दीमकों और मौसम ने खा लिया। यह सफाई इतनी मासूम है कि अपराध भी खुद को ठगा हुआ महसूस करे।

यह पहला मौका है जब सरकारी बयान ने जीव-जंतुओं को भ्रष्टाचार की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है। अब तक घोटालों में नेता, अफसर, दलाल और ठेकेदार बदनाम होते थे, लेकिन कवर्धा ने इतिहास रच दिया यहाँ चूहे मुख्य अभियुक्त हैं। वे भी ऐसे चूहे, जो क्विंटल में खाते हैं, रजिस्टर में एंट्री करवाते हैं, फर्जी बिल बनवाते हैं और जाते-जाते CCTV की आंखों पर पट्टी भी बाँध देते हैं। यह कोई साधारण चूहा नहीं, बल्कि सिस्टम-अनुकूल चूहा है।

प्रश्न यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कैसे गायब हुआ। असली प्रश्न यह है कि इतना धान गायब होने के बाद भी सिस्टम कैसे खड़ा है? गोदामों में धान आता है, तौला जाता है, सील होता है, निरीक्षण होता है, रिपोर्ट बनती है और फिर एक दिन पता चलता है कि धान था ही नहीं। यह जादू नहीं, यह प्रशासनिक कला है। इसे भ्रष्टाचार कहना इस कला का अपमान होगा; यह तो प्रशासनिक शिल्प है।

प्रशासन की सफाई बताती है कि चूहे और दीमक अब सिर्फ अनाज या लकड़ी नहीं खाते, वे जवाबदेही भी खाते हैं। मौसम सिर्फ फसल नहीं खराब करता, वह फाइलें भी साफ कर देता है। यह वही मौसम है जो हर घोटाले के बाद अचानक सक्रिय हो जाता है कभी बारिश बनकर, कभी नमी बनकर, कभी “लंबे समय तक भंडारण” के बहाने। लगता है प्रकृति भी अब सरकारी तंत्र का हिस्सा बन चुकी है।

विपक्ष ने इसे घोटाला कहा, जनता ने मज़ाक बनाया और प्रशासन ने औपचारिक कार्रवाई। कुछ निलंबन, कुछ नोटिस यानी संस्कार अनुसार शोकसभा । असली दोषी वहीं सुरक्षित हैं, जहाँ हर घोटाले के बाद रहते हैं फ़ाइलों के पीछे, पदों के ऊपर और व्यवस्था की छाया में। निलंबन यहाँ सज़ा नहीं, रिवाज़ है। नोटिस यहाँ सवाल नहीं, ढाल है।

यह पूरा प्रकरण बताता है कि भ्रष्टाचार अब चोरी नहीं करता, वह प्रक्रिया का पालन करता है। सब कुछ नियमों के भीतर होता है काग़ज़ पूरे, हस्ताक्षर पूरे, मुहरें पूरी। कमी सिर्फ गोदाम में होती है। और जब कमी पकड़ में आती है, तो कारण इतने प्राकृतिक होते हैं कि मानव जिम्मेदारी की जरूरत ही नहीं पड़ती।

कल्पना कीजिए यदि किसी किसान के घर से एक बोरी धान गायब हो जाए, तो क्या वह यह कह सकता है कि “चूहे खा गए”? शायद नहीं। उससे पूछा जाएगा लापरवाही क्यों की, सुरक्षा क्यों नहीं की। लेकिन जब सरकारी गोदाम से सात करोड़ का धान गायब होता है, तो सवाल उल्टा हो जाता है बेचारे चूहे क्या करें ? यही तो शासन और आम आदमी का फर्क है। आम आदमी दोषी होता है, सिस्टम हमेशा पीड़ित।

यह मामला यह भी बताता है कि निगरानी तंत्र सिर्फ काग़ज़ पर जिंदा है। CCTV कैमरे थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं देखा। रजिस्टर थे, लेकिन उन्होंने सब कुछ सही बताया। निरीक्षण हुए, लेकिन किसी को कमी नहीं दिखी। यह सामूहिक अंधापन नहीं, सहमति से ओढ़ी गई पट्टी है। जब सबको पता हो कि क्या नहीं देखना है, तब कुछ भी नहीं दिखता।

कवर्धा का यह प्रकरण एक जिले की कहानी नहीं है। यह उस राज्य और उस व्यवस्था का प्रतीक है, जहाँ धान खरीदी किसान के नाम पर होती है, लेकिन फायदा हमेशा किसी और को मिलता है। किसान खेत में खड़ा रहता है, धूप में, कर्ज़ में, इंतज़ार में और धान गोदाम पहुँचते ही अदृश्य हो जाता है। न किसान को जवाब, न जनता को हिसाब। आज चूहे हैं, कल कुछ और होगा। कभी कहा जाएगा नमी ज्यादा थी। कभी रिकॉर्ड पुराना था। कभी मानव भूल। लेकिन एक बात स्थायी रहेगी ऊपर तक कोई जिम्मेदार नहीं। क्योंकि जिम्मेदारी वहीं मर जाती है, जहाँ सत्ता शुरू होती है।

सबसे खतरनाक यह नहीं कि धान गायब हुआ। सबसे खतरनाक यह है कि इसे लेकर सिस्टम शर्मिंदा नहीं है। वह सफाई दे रहा है, तर्क दे रहा है, बहस कर रहा है और आगे बढ़ रहा है। यह निर्लज्जता ही असली संकट है। जब घोटाला भी रूटीन हो जाए, तब लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रस्म बनकर रह जाता है।

कवर्धा ने हमें यह सिखाया है कि आज के शासन में चूहा सबसे सुरक्षित पात्र है। न उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, न उससे पूछताछ। वह हर बार बच निकलता है बिल्कुल वैसे ही जैसे असली दोषी। फर्क सिर्फ इतना है कि चूहा भूखा होता है, और व्यवस्था लालची।

मेरा यह कथन किसी चूहे के खिलाफ नहीं है। यह उस तंत्र के खिलाफ है, जिसने चूहे को बहाना बना लिया है। क्योंकि सच यह है कि धान चूहों ने नहीं खाया धान व्यवस्था ने खाया है। और जब व्यवस्था खुद खाने लगे, तब देश सिर्फ गोदाम नहीं खोता, विश्वास भी खो देता है। 

आज सवाल यह नहीं है कि 26 हजार क्विंटल धान कहाँ गया। सवाल यह है कि हमारी जवाबदेही, हमारी नैतिकता और हमारी शासन व्यवस्था कब और कहाँ गायब हुई ? और उसका जवाब शायद किसी गोदाम में नहीं मिलेगा वह कहीं फाइलों के बीच, नोटिसों के नीचे और चूहों की आड़ में दफन है।

कैमरे की कलम: राष्ट्रीय परिसंवाद या मौन सम्मेलन ?


किसी विश्वविद्यालय का सभागार आमतौर पर ज्ञान, संवाद और असहमति का सुरक्षित स्थल माना जाता है। यहाँ सवाल पूछे जाते हैं, बहस होती है और कभी-कभी तीखी असहमति भी सामने आती है लेकिन वही असहमति विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाती है। यदि वहाँ सिर्फ़ ताली बजाने वाले श्रोता चाहिए हों, तो वह मंच अकादमिक नहीं, मनोरंजनात्मक हो जाता है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरू घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी में हाल में जो हुआ, उसने यही बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय अब संवाद के लिए हैं या केवल कुर्सियों की पूजा के लिए।

घटना एक राष्ट्रीय परिसंवाद की है, विषय था ‘समकालीन हिन्दी कहानी : बदलते जीवन संदर्भ’। यानी ऐसा विषय जिसमें जीवन की जटिलताएँ, विडंबनाएँ और असहमति स्वाभाविक हैं। आयोजन साहित्य अकादमी, दिल्ली के सहयोग से था। मंच पर देश के कई प्रतिष्ठित साहित्यकार मौजूद थे, जिनमें कथाकार मनोज रूपड़ा भी शामिल थे। लेकिन परिसंवाद साहित्य से अधिक सत्ता और संवेदनशीलता के टकराव का मंच बन गया।

बताया जाता है कि विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल अपने वक्तव्य में विषय से भटकते हुए चुटकुलों के सहारे श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे। यह कोई अपराध नहीं है जब तक कि चुटकुले ज्ञान का विकल्प न बनने लगें। लेकिन जब कुलपति ने मंच पर बैठे कथाकार से यह पूछ लिया कि वे कहीं बोर तो नहीं हो रहे, तो मानो उन्होंने स्वयं संवाद का दरवाज़ा खोल दिया। कथाकार ने भी उसी खुले दरवाज़े से भीतर कदम रखते हुए सिर्फ़ इतना कहा “आप विषय पर नहीं बोल रहे हैं।”

यहीं से विश्वविद्यालय का सभागार अचानक अदालत में बदल गया, जहाँ जज भी वही थे, अभियोजक भी वही और फ़ैसला सुनाने वाले भी वही। एक साधारण-सी टिप्पणी को असहिष्णुता का ऐसा झोंका लगा कि कुलपति ने सार्वजनिक मंच से ही अतिथि लेखक को अनुशासनहीन, बदतमीज़ और अवांछित घोषित कर दिया। फिर आदेश आया बाहर जाइए। मानो यह कोई विश्वविद्यालय नहीं, निजी ड्रॉइंग रूम हो, जहाँ मेहमान वही टिक सकता है जो मेज़बान की हर बात पर सिर हिलाए।

विडंबना यह है कि विश्वविद्यालय में कुलपति को पहला विद्वान माना जाता है, पहला शिक्षक, पहला श्रोता भी। लेकिन यहाँ तो पहला श्रोता ही सवाल सुनने को तैयार नहीं था। सवाल सुनते ही कुर्सी ने अपनी असली शक्ति दिखा दी। यह वही कुर्सी है जो आदमी को ऊँचा नहीं करती, लेकिन उसे यह भ्रम ज़रूर दे देती है कि वह ऊँचा हो गया है।

वीडियो में दिखता है कि कुछ श्रोता कथाकार के साथ सभागृह से बाहर निकल गए। यह दृश्य किसी विरोध प्रदर्शन जैसा नहीं था, बल्कि एक मौन असहमति थी जैसे कोई कह रहा हो, “अगर सवाल पूछना अपराध है, तो हम इस अदालत में नहीं बैठेंगे।” यह शायद उस दिन की सबसे सार्थक प्रतिक्रिया थी।

अब सवाल उठता है क्या विश्वविद्यालयों में असहमति की कोई जगह बची है? क्या ‘राष्ट्रीय परिसंवाद’ का अर्थ यह है कि मंच से केवल वही बोला जाए जो सत्ता को अच्छा लगे? अगर ऐसा ही है, तो फिर विश्वविद्यालय और सरकारी दफ़्तर में क्या अंतर रह जाता है?

कुलपति का पद केवल प्रशासनिक नहीं होता, वह नैतिक और बौद्धिक नेतृत्व का भी प्रतीक होता है। गुरु घासीदास जैसे संत के नाम पर बने विश्वविद्यालय से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वहाँ विनम्रता और संवाद की परंपरा होगी। लेकिन यहाँ तो हाथ हिलाकर अतिथि को बाहर निकालना ही संवाद का अंतिम रूप बन गया।

यह तर्क दिया जा सकता है कि मंच की मर्यादा बनाए रखना ज़रूरी है। यह बात सही है। लेकिन मर्यादा केवल अतिथि के लिए नहीं होती, मेज़बान के लिए भी होती है। और जब मर्यादा की परिभाषा यह हो जाए कि “आप हमारी बात से असहमत नहीं हो सकते”, तो वह मर्यादा नहीं, मौन का अनुशासन कहलाता है।

कुलपति बनने से पहले वे गुजरात के सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रह चुके हैं। यानी अकादमिक जीवन में बहस, सवाल और आलोचना से उनका परिचय नया नहीं होना चाहिए। फिर भी यदि एक टिप्पणी से इतना विचलन हो जाए कि सार्वजनिक अपमान का रास्ता चुना जाए, तो समस्या टिप्पणी में नहीं, संवेदनशीलता के अभाव में है।

यह घटना केवल एक लेखक और एक कुलपति के बीच का विवाद नहीं है। यह उस व्यापक संकट का लक्षण है, जिसमें संस्थानों की कुर्सियाँ व्यक्तियों से बड़ी हो गई हैं। जहाँ आलोचना को दुश्मनी समझा जाने लगा है और असहमति को अनुशासनहीनता। विश्वविद्यालयों में उत्कृष्टता इसी वजह से घट रही है क्योंकि सवाल पूछने वाले कम होते जा रहे हैं और ताली बजाने वाले बढ़ते जा रहे हैं।

अचरज की बात यह भी है कि ऐसी घटनाओं पर व्यवस्था की चुप्पी अब असामान्य नहीं रही। न केंद्र सरकार से कोई प्रतिक्रिया, न राज्यपाल स्तर से कोई सवाल। शायद इसलिए कि बदतमीजी अब अपवाद नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे ‘नया सामान्य’ बनती जा रही है। गरिमा जैसे शब्द अब भाषणों में ज़्यादा मिलते हैं, व्यवहार में कम।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या साहित्यकारों, शिक्षाविदों और पत्रकारों को ऐसे कुलपतियों के रहते विश्वविद्यालयों का बहिष्कार नहीं करना चाहिए? यह बहिष्कार किसी विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि व्यवहार के ख़िलाफ़ होना चाहिए। यह किसी वाम-दक्षिण की लड़ाई नहीं, बल्कि न्यूनतम इंसानियत की माँग है। कहा जाता है कि वाम और दक्षिण के बीच कहीं एक मानवपंथ भी होना चाहिए। शायद वही मानवपंथ हमें यह सिखाता है कि सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन शब्द स्थायी। और शब्दों के साथ किया गया अन्याय देर-सबेर इतिहास में दर्ज हो जाता है।

यदि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को अपनी संवैधानिक भूमिका का ज़रा भी अहसास है, तो उन्हें इस घटना के वीडियो को केवल देखना नहीं चाहिए, बल्कि यह सवाल भी पूछना चाहिए कि विश्वविद्यालयों को भय और अहंकार का प्रयोगशाला बनाने का अधिकार आखिर किसने दिया ?

फिलहाल, समाज के पास ऐसे अहंकार का कोई बड़ा इलाज नहीं है। न अदालतें, न आयोग, न समितियाँ। लेकिन एक छोटा-सा लोकतांत्रिक उपाय अब भी बचा है स्मृति। लोग याद रखें कि किसने सवाल को अपमान समझा और किसने अपमान को सवाल बना दिया। और अगर कोई चिट्ठी भेजनी ही हो, तो उसमें लंबे भाषण की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी एक वाक्य भी पर्याप्त होता है  “आप कुर्सी पर तो बैठे हैं, लेकिन गरिमा अभी बाहर खड़ी है।”

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