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बाबा-ब्रांड साजिश जिन्हें दिखती नहीं, उनके लिए..

कुछ दिन पहले अभी जब भारत के योग और आयुर्वेद के एक सबसे बड़े पाखंडी बाबा रामदेव ने अपनी कंपनी पतंजलि की नई दवाएं पेश करते हुए मीडिया और कैमरों के सामने दावा किया कि यह कोरोना का इलाज है, और तरह-तरह की सरकारी मंजूरियों और दवाओं के मानव-परीक्षण का दावा किया, तो अगले ही दिन इस भगवे गुब्बारे की हवा निकल गई। केन्द्र सरकार को नोटिस जारी करना पड़ा, और सफाई देनी पड़ी कि उसने कोई इजाजत नहीं दी है। जिस उत्तराखंड में बाबा का यह खरबपति कारोबार है, वहां की भाजपा सरकार को भी इस कंपनी को नोटिस जारी करना पड़ा। पुलिस में एक रिपोर्ट हुई, और शायद अदालत में भी एक केस किया गया। कुल मिलाकर बाबा इतनी बुरी तरह घिरा कि उसे तुरंत अपने उगले हुए शब्द निगलने पड़े कि यह कोरोना की दवाई है। उसके बाद से बाबा और उसकी कंपनी की बोलती बंद है। लेकिन सोशल मीडिया पर जो हिन्दुत्ववादी, राष्ट्रवादी फौज ओवरटाईम करती है, उसने तुरंत बाबा-ब्रांड आयुर्वेद के खिलाफ किसी भी कार्रवाई को तुरंत ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों की साजिश करार दे दिया, और लगातार अभियान चलने लगा कि यह हिन्दुस्तान के गौरवशाली आयुर्वेद के खिलाफ पश्चिमी दवा कंपनियों की साजिश है। अब सवाल यह उठता है कि बाबा को नोटिस देने वाली केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार इस साजिश में भागीदार कही जाएगी या फिर उत्तराखंड की भाजपा सरकार? 
दरअसल जब किसी ब्रांड को ही उस सामान का अकेला मालिक बना दिया जाता है, तो ऐसा ही होता है। हिन्दुस्तान में हजारों बरसों से आयुर्वेद और योग का इतिहास बताया जाता है। लेकिन इन दोनों की इतनी बुरी नौबत कभी नहीं आई थी क्योंकि इन दोनों को किसी साजिश के तहत इस तरह कभी नहीं भुनाया गया था। रामदेव के पहले न किसी ने योग को ऐसा दुहा था कि दूध के साथ खून भी निकल आए, और न ही आयुर्वेद को लेकर ऐसे अवैज्ञानिक दावे किसी ने किए थे। यह पहली बार हो रहा है कि देश की इन गौरवशाली परंपराओं के साथ ऐसा खिलवाड़ हो रहा है, और उन्हें टकसाल की तरह चलाने के लिए ऐसी भगवा साजिश हो रही है। अब जो लोग राष्ट्र को बाबा से जोडक़र देखना चाहते हैं, जो देश को बाबा-ब्रांड आयुर्वेद और योग से जोडक़र देखते हैं, उन्हें इस बाबा से कोई भी सवाल नाजायज और देश के साथ गद्दारी लगेंगे ही। यह समझने की जरूरत है कि जो लोग बाबा को राष्ट्रीयता और देश के गौरवशाली इतिहास का ब्रांड एम्बेसडर मानकर चलते हैं, उन्हें तो बाबा को सवालों से उसी तरह परे और ऊपर रखना है जिस तरह भारत माता से कोई सवाल नहीं हो सकता, भगवान राम से कोई सवाल नहीं हो सकता। 
जिस आयुर्वेद की हिन्दुस्तान के बाहर भी खासी इज्जत थी, उस आयुर्वेद को फुटपाथ पर ताबीज बेचने वाले के अंदाज में बेचकर बाबा ने उसे मिट्टीपलीद कर दिया। जिसे अपने काम से काम रखना था, उसने योगी की तरह योग की बात करने के बजाय यूपीए सरकार के खिलाफ ऐसा भयानक आंदोलन छेड़ा था कि वह सलवार-कुर्ता पहनकर 35 रूपए लीटर में पेट्रोल बेच रहा था, दुनिया से सारा कालाधन वापिस ला रहा था, हर हिन्दुस्तानी के खाते में 15 लाख रूपए डाल रहा था, और डॉलर की कीमत 35 रूपए कर रहा था। इंटरनेट की मेहरबानी से रजत शर्मा के टीवी शो के बाबा के ये सब दावे और इन पर मौजूदा भीड़ की तालियां अभी भी देखी जा सकती हैं। नतीजा यह हुआ कि ये सब दावे झूठे साबित होने के साथ-साथ एक जनधारणा यह बनी कि शायद योग और आयुर्वेद भी ऐसे ही फर्जी सामान हैं, इस बाबा के दावों सरीखे। 
लोकतंत्र में ऐसी कई हरकतों की गुंजाइश रहती है, इसलिए लोगों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि न आयुर्वेद, और न योग को लोकतंत्र और देश से जोडऩा चाहिए, मोदी सरकार के समर्थन से जोडऩा चाहिए, या कि पिछली यूपीए सरकार के विरोध का हथियार उन्हें बनाना चाहिए। जब कभी ऐसा बेजा इस्तेमाल होता है, बाबाओं की तो इज्जत क्या मिटेगी, देश के गौरवशाली इतिहास की चिकित्सा और जीवनशैली की इन बातों की इज्जत मिट्टी में मिलती है। जब पतंजलि जैसा कोई कारोबार अपने सामानों को बेचने को देश की सेवा साबित करता है, और उन्हें खरीदना देशभक्ति और राष्ट्रवाद का सुबूत बताता है, तो इससे राष्ट्र की इज्जत खतरे में पड़ती है। कोई कारोबार देशभक्ति नहीं हो सकता, और कोई ब्रांड राष्ट्रवाद नहीं हो सकता। योग या आयुर्वेद कभी लोकतंत्र का विकल्प नहीं हो सकते, और हिन्दुस्तान जैसे विविधतावादी देश में किसी एक धर्म को राष्ट्रवाद का एकाधिकार नहीं मिल सकता। यह पूरा सिलसिला कुछ उसी किस्म का है कि देशभक्ति की फिल्मों को बनाने और उनमें एक्टिंग करने को मनोज कुमार देश सेवा या राष्ट्रवाद मान लें। 
न तो लोकतंत्र में, और न ही जिंदगी के किसी और दायरे में दो चीजों को मिलाना चाहिए। धर्म और आध्यात्म की दुकान चलाने वाले बड़े-बड़े बापू और बाबा जिस तरह आज जेलों में कैद हैं, उससे यह समझना चाहिए कि राजनीति में इनका इस्तेमाल गलत रहा, और बुरी बात रही। धर्म और आध्यात्म को अपनी दुकान अलग चलाने देना चाहिए, और प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्रियों को उसका फीता काटकर वहां से खरीददारी करने के धंधे में नहीं पडऩा चाहिए। जिन लोगों को यह लगता है कि इस बाबा रामदेव के अवैज्ञानिक और बेवकूफ बनाने वाले झूठे दावों का विरोध देश के इतिहास का विरोध है, देश के गौरव का विरोध है, वे इस अभियान को चलाने के लिए अगर कुछ कमा रहे हैं तब तो ठीक है, लेकिन अगर बिना कमाए वे यह अभियान चला रहे हैं, तो फिर यह अपनी खुद की साख के खिलाफ एक आत्मघाती काम कर रहे हैं। हिन्दुस्तान का लोकतंत्र किसी योग और आयुर्वेद का मोहताज नहीं है, वह किसी बाबा का मोहताज भी नहीं है। सच तो यह है कि इस लोकतंत्र के जन्म का इतिहास न तो अकेले भगत सिंह का मोहताज था, और न ही गांधी का। यह लोकतंत्र ऐसे लोगों की मेहनत से हासिल हुआ है जिनके लिए हिन्दू और मुस्लिमों में फर्क नहीं था, जिनके लिए अपनी कमाई हुई जायदाद देश के नाम करने में हिचक नहीं थी, जिनके मन में जेल अंग्रेजों की जेल जाने का, और वहां रहने का खौफ नहीं था, जिनके मन में अंग्रेज-जेल के फांसी के फंदे का डर नहीं था, और न ही गोडसे की गोलियों का डर था। ऐसी कुर्बानी देने वाले लोगों का हासिल किया हुआ यह लोकतंत्र पाखंडी बाबाओं का मोहताज तो कभी भी नहीं रहेगा। धर्म और योग के नाम पर भगवा पैकिंग में राष्ट्रवाद बेचने की ऐसी बाबाई साजिश से धर्म और योग का जितना बड़ा नुकसान हुआ है, उतना बड़ा नुकसान तो सैकड़ों बरस के मुगल राज में, और डेढ़ सौ बरस के अंग्रेजी राज में भी नहीं हुआ था। यह बात जिनको समझ नहीं पड़ती है, वे फुटपाथ पर ताबीज खरीदने की तरह ऐसे बाबाओं से अपने देशप्रेमी होने की रसीद लेने उनकी दुकान जाएं और खरीददारी करें। 
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