ब्रज आयरन एंड स्टील प्लांट में पकड़ी गई कोयला गड़बड़ी, कांग्रेस के राम गिरफ्तार


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  / जिले में कोयला परिवहन और सप्लाई से जुड़ी बड़ी गड़बड़ी का मामला सामने आया है। उच्च गुणवत्ता का कोयला भेजने के नाम पर निम्न गुणवत्ता का कोयला सप्लाई किए जाने के आरोप में पुलिस ने एक डिपो संचालक को गिरफ्तार किया है।

पुलिस के अनुसार प्रार्थी आशीष केशरी निवासी पेंड्रा ने शिकायत दर्ज कराई थी कि वह कोल परिवहन एवं लिफ्टिंग का कार्य करता है। वर्तमान में उसने एसईसीएल रामपुर खदान से ट्रेलर क्रमांक CG 12 S 8901 और CG 04 HX 4888 में जी-6 श्रेणी का उच्च गुणवत्ता वाला कोयला लोड कराकर ब्रज आयरन एंड स्टील लिमिटेड डिघोरा भेजा था।

प्लांट में पहुंचने के बाद केमिस्ट द्वारा कराई गई लैब जांच में कोयले की गुणवत्ता कम पाई गई। जहां कोयले का जीसीवी 5500 से 5800 होना था, वहीं परीक्षण में यह 4203 और 4220 जीसीवी निकला। इसके बाद मामले की शिकायत पुलिस में की गई।

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच शुरू की। घटनास्थल का निरीक्षण कर पंचनामा और नक्शा तैयार किया गया। यार्ड में मौजूद निम्न गुणवत्ता वाले कोयले का सैंपल लेकर जांच के लिए भेजा गया, जबकि दोनों ट्रेलरों और कोयले को जब्त कर लिया गया। जांच में डिपो संचालक और कांग्रेस नेता राम कुमार आर्य निवासी चकरभाठा के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर 24 मई को न्यायिक रिमांड पर भेज दिया।

इधर हिर्री पुलिस ने कोयला व्यापारी आशीष केसरी से रंगदारी और धमकी देकर पैसे की उगाही करने वाले आरोपी अश्वनी कुमार साहू को त्वरित कार्रवाई करते हुए चंद घंटों में गिरफ्तार कर लिया गया है। कोयला कारोबार से जुड़े इन मामलों में संलिप्त दोनों आरोपी को न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है।

घर से लापता नाबालिग को ले जाकर दुष्कर्म, पुलिस ने आरोपी को दबोचा


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  / बिल्हा थाना क्षेत्र में नाबालिग को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले जाने और दुष्कर्म करने के आरोप में पुलिस ने एक युवक को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया है।

पुलिस के अनुसार प्रार्थी ने 23 मई को थाना पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई कि उसकी नाबालिग बेटी 22 मई को बिना बताए घर से चली गई थी। अगले दिन डायल-112 से सूचना मिलने पर बालिका को थाना बिल्हा लाया गया। पूछताछ के दौरान नाबालिग ने बताया कि बिल्हा निवासी दीपक दास मानिकपुरी उसे ग्राम बरतोरी से बहला-फुसलाकर अपने घर ले गया था, जहां उसने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

मामले की जानकारी मिलते ही थाना प्रभारी ने वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत कराया। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के निर्देश में पुलिस टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया।

गिरफ्तार आरोपी की पहचान दीपक दास मानिकपुरी (24 वर्ष) निवासी बिल्हा के रूप में हुई है। पूछताछ में अपराध सामने आने पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर 24 मई को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया।

कबाड़ माफिया के आरोपी कुर्सी पर पैर रखकर पीते रहे चाय, दो पुलिसकर्मी लाइन अटैच


बिलासपुर। 
 TODAY छत्तीसगढ़  / छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में अवैध कबाड़ कारोबार के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के बीच कोनी थाने से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला उन दो आरोपियों से जुड़ा है जिन्हें कबाड़ कारोबार से संबंधित कार्रवाई में गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि पुलिस कस्टडी में होने के बावजूद उन्हें थाने में “वीआईपी ट्रीटमेंट” दिया गया।

जानकारी के मुताबिक 22 मई को पुलिस ने जिले में कई स्थानों पर दबिश देकर 40 संदिग्ध कबाड़ दुकानों और गोदामों को सील किया था। इसके अगले दिन कोनी पुलिस ने छोटी कोनी इलाके से करीब तीन क्विंटल अवैध कबाड़ जब्त कर दो लोगों अकबर खान और मंसूर बेग को गिरफ्तार किया। आरोप है कि दोनों आरोपियों को हवालात में रखने के बजाय थाने के मुंशी कक्ष में बैठाया गया, जहां उन्हें चाय-नाश्ता और ब्रांडेड पानी दिया गया। बताया जा रहा है कि एक आरोपी पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में आराम से कुर्सी पर पैर रखकर बैठा था। 

मामले को गंभीर मानते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह ने हेड कांस्टेबल बालेश्वर तिवारी और कांस्टेबल अनुज जांगड़े को लाइन अटैच कर दिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है और अनुशासनहीनता पाए जाने पर आगे भी कार्रवाई की जाएगी। 


कैमरे की कलम: 'सरकार के कंधे कमजोर, बहू की पीठ मजबूत'

“डिजिटल इंडिया” का सपना अब गांव-गांव तक पहुंच चुका है। सरकारी विज्ञापनों में बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान है, मोबाइल पर अंगूठा लगाते ही पेंशन खाते में आ जाती है, और ‘घर-पहुंच सेवा’ का दावा यह भरोसा देता है कि अब सरकार गरीब के दरवाजे तक उतर आई है लेकिन छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट से आई एक तस्वीर ने इन तमाम दावों की चमक को उतारकर धरती की धूल में पटक दिया है।

राज्य में सुशासन तिहार के बीच एक बहू अपनी 90 वर्षीय बूढ़ी सास को पीठ पर लादकर पाँच किलोमीटर पैदल चल रही है। रास्ते में नदी-नाले हैं, पथरीली चढ़ाइयां हैं, जंगल है, थकान है, बेबसी है। यह कोई तीर्थयात्रा नहीं थी, न किसी अस्पताल की आपात स्थिति। यह यात्रा सिर्फ 500 रुपये की वृद्धावस्था पेंशन के लिए थी। कल्पना कीजिए, जिस देश में करोड़ों रुपये के डिजिटल ट्रांजैक्शन सेकंडों में हो रहे हों, वहां एक वृद्ध महिला को अपने ही हक के पाँच सौ रुपये पाने के लिए इंसानी बोझ बन जाना पड़े — इससे बड़ा व्यंग्य लोकतंत्र पर और क्या होगा?

सरकार कहती है कि अब सबकुछ “ऑनलाइन” है। मगर सवाल यह है कि क्या इंसानियत भी ऑनलाइन हो चुकी है? क्या संवेदनाएं भी अब सर्वर से चलती हैं? और क्या गरीब की पीड़ा भी अब “केवाईसी अपडेट नहीं” के संदेश में बदल दी गई है? यह घटना सिर्फ एक परिवार की गरीबी नहीं दिखाती, बल्कि उस व्यवस्था का चेहरा उजागर करती है जो योजनाओं की फाइलों में बहुत दयालु दिखती है, लेकिन जमीन पर पहुंचते-पहुंचते पत्थर हो जाती है।

बहू सुखमनिया रोते हुए कहती है कि पहले बैंक मित्र घर आकर पैसे दे जाता था। फिर अचानक उसने आना बंद कर दिया। किसी ने कारण नहीं बताया। पेंशन रुक गई। केवाईसी का बहाना सामने आ गया। अब सोचिए, जंगलपारा जैसे दूरस्थ गांव में रहने वाली एक अशिक्षित महिला को कौन समझाएगा कि केवाईसी क्या होता है?
उसके लिए तो बैंक ही एक ऐसा भवन है, जहां जाने भर से डर लगता है। वहां की भाषा अलग, प्रक्रिया अलग, चेहरे अलग। वह केवल इतना जानती है कि सरकार ने बुजुर्गों के लिए कुछ पैसे तय किए हैं और वही पैसे अब नहीं मिल रहे।

व्यवस्था का सबसे क्रूर चेहरा यही होता है — जब वह अपनी असफलताओं को नियमों के पीछे छिपा देती है। बैंक प्रबंधन ने सफाई दी है कि “अगर सूचना दे दी जाती, तो बैंक मित्र घर पहुंच जाता।” वाह! यानी अब गरीब को यह भी पता होना चाहिए कि सुविधा मांगने की प्रक्रिया क्या है, जो महिला अपने गांव से बाहर की दुनिया नहीं जानती, उससे यह उम्मीद की जा रही है कि वह बैंकिंग नियमों की जानकारी रखे, आवेदन करे, सूचना दे, अनुरोध करे और फिर इंतजार करे। ये कड़वी सच्चाई है कि व्यवस्था ने गरीब को नागरिक नहीं, फाइल बना दिया है।

आज गांवों में सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, बल्कि “सूचना की गरीबी” है। योजनाएं हैं, लेकिन जानकारी नहीं। अधिकार हैं, लेकिन पहुंच नहीं। सरकारें मान बैठी हैं कि योजना घोषित कर देने भर से उसका लाभ लोगों तक पहुंच जाता है। असलियत यह है कि योजना और जरूरतमंद के बीच सबसे लंबा रास्ता “व्यवस्था” का होता है।

विडंबना देखिए, देश चांद पर पहुंच गया, लेकिन सरगुजा की एक बूढ़ी महिला अपने बैंक तक नहीं पहुंच पाई। सरकारी भाषणों में अक्सर कहा जाता है कि “अब कोई पीछे नहीं छूटेगा, लेकिन हकीकत यह है कि सबसे पहले वही लोग छूट जाते हैं, जिनके नाम पर योजनाएं बनती हैं — गरीब, आदिवासी, बुजुर्ग, विधवा और अशिक्षित।

दरअसल हमारी व्यवस्था में गरीब को सुविधा नहीं, प्रमाण देना पड़ता है। उसे हर बार साबित करना पड़ता है कि वह जिंदा है, गरीब है, पात्र है, और मदद के लायक है। कितनी विचित्र बात है कि 90 वर्षीय सोमारी बाई जो चलने-फिरने में असमर्थ है उसे यह साबित करने बैंक जाना पड़ रहा है कि वह अब भी जीवित है। मानो सरकार कह रही हो — “जब तक तुम खुद चलकर हमारे सामने नहीं आओगी, हमें यकीन नहीं होगा कि तुम्हें पेंशन चाहिए।” यह संवेदनहीनता केवल प्रशासनिक नहीं, नैतिक भी है।

आज गांवों में बैंक मित्र, पंचायत सचिव, पटवारी, राशन दुकानदार — यही सरकार का चेहरा हैं। लेकिन अक्सर यही चेहरे सबसे अधिक निराश करते हैं। क्योंकि व्यवस्था की निगरानी ऊपर से होती है, मगर पीड़ा नीचे पैदा होती है और नीचे पैदा हुई पीड़ा अक्सर ऊपर तक पहुंचती ही नहीं। यहां सवाल केवल एक बैंक मित्र की लापरवाही का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जिसमें गरीब की तकलीफ को “सामान्य” मान लिया गया है। अगर किसी महानगर में किसी बुजुर्ग को बैंक में लाइन में खड़ा होना पड़े, तो टीवी डिबेट शुरू हो जाती है। लेकिन जंगलपारा की एक महिला अपनी सास को पीठ पर ढोकर बैंक ले जाए, तो उसे “ग्रामीण कठिनाई” कहकर सामान्य बना दिया जाता है। गरीबी इस देश में अब संवेदना नहीं जगाती, वह सिर्फ आंकड़ा बनकर रह गई है।

सरकारें योजनाओं के नाम बदलने में तेज हैं। हर नई योजना के साथ नया नारा, नया लोगो, नया प्रचार आता है। लेकिन जिन लोगों के लिए ये योजनाएं बनाई जाती हैं, उनकी जिंदगी में कुछ नहीं बदलता। उनके हिस्से में वही टूटी सड़कें, वही अधूरी जानकारी, वही बंद दफ्तर और वही इंतजार आता है। सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरी घटना में किसी को अपराधबोध नहीं है।

बैंक कह रहा है — “हमें बताया नहीं गया।”  प्रशासन कहेगा — “मामला संज्ञान में आया है।” नेता कहेंगे — “जांच होगी।” और फिर कुछ दिनों बाद यह खबर किसी नई वायरल घटना के नीचे दब जाएगी लेकिन उस बूढ़ी महिला की पीठ का दर्द, उस बहू की थकान और उनकी बेबसी किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज नहीं होगी। हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि यहां गरीब की तकलीफ खबर बनती है, समाधान नहीं। अगर सचमुच सरकार “घर-पहुंच सेवा” देना चाहती है, तो उसे पहले यह समझना होगा कि सुविधा का मतलब केवल तकनीक नहीं होता।

एक बुजुर्ग महिला को पेंशन देने के लिए बैंक मित्र का घर तक जाना “कृपा” नहीं, उसकी जिम्मेदारी है और यदि वह जिम्मेदारी निभाई नहीं गई, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। आज जरूरत इस बात की नहीं है कि इस घटना पर दुख जताया जाए। जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था अपने भीतर झांके, क्योंकि यह सिर्फ सरगुजा की कहानी नहीं है। यह देश के हजारों गांवों की कहानी है, जहां योजनाएं कागज पर दौड़ती हैं और लोग पथरीले रास्तों पर।

हमें यह तय करना होगा कि “डिजिटल इंडिया” का मतलब क्या है। क्या यह सिर्फ शहरों के लिए तेज इंटरनेट है?
या फिर उस बुजुर्ग महिला तक सम्मानपूर्वक पेंशन पहुंचाना भी इसका हिस्सा है? किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके शहर कितने चमकदार हैं। उसकी पहचान इससे होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है। सरगुजा की यह तस्वीर हमें आईना दिखाती है। उस आईने में सरकार भी है, बैंक भी, प्रशासन भी और हम सब भी, क्योंकि हम सब धीरे-धीरे ऐसे समाज में बदलते जा रहे हैं, जहां गरीब की पीड़ा देखकर कुछ क्षण दुख तो होता है, लेकिन व्यवस्था बदलने की बेचैनी नहीं होती। शायद यही सबसे बड़ा खतरा है और अंत में, उस बहू की पीठ पर बैठी बूढ़ी सासू मां सिर्फ अपनी पेंशन लेने नहीं जा रही थी। वह इस देश की विकास यात्रा, सुशासन तिहार का सच ढो रही थी। एक ऐसा सच, जो बताता है कि सरकार अभी भी गरीब के घर तक नहीं पहुंची है। दावे कुछ भी हों लेकिन हकीकत ये है कि सरकार आज भी गरीब की पीठ पर लदी हुई चल रही है।

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