अनुशासन, विश्वास और सौहार्द की मिसाल बनी रायगढ़ की रामनवमी


रायगढ़। 
 TODAY छत्तीसगढ़  /  शहर के साथ साथ जिले में इस वर्ष रामनवमी की शोभायात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन भर नहीं रही बल्कि यह कानून के राज, सामाजिक सौहार्द और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के सफल समन्वय की सशक्त मिसाल बनकर उभरी है। लंबे समय से ऐसे आयोजनों के साथ जुड़ी आशंकाओं, दबाव और अव्यवस्था की छवि को इस बार निर्णायक रूप से बदला गया है और इसके केंद्र में रही पुलिस की अनुशासनात्मक पहल।

कानून का भरोसा—सबसे बड़ा परिवर्तन

किसी भी समाज में कानून का वास्तविक प्रभाव तब दिखता है, जब आम नागरिक बिना भय के अपने सामाजिक और धार्मिक अधिकारों का पालन कर सके। रायगढ़ में इस बार यही हुआ। जहां पहले रामनवमी जैसे आयोजनों के दौरान एक अदृश्य डर का माहौल रहता था व्यापारी वर्ग दबाव में रहता था और आम नागरिक दूरी बनाकर चलते थे वहीं इस बार लोगों ने खुलकर भागीदारी निभाई। यह बदलाव केवल व्यवस्था का नहीं, बल्कि मानसिकता का परिवर्तन है और इस परिवर्तन की जड़ में है कानून के प्रति बढ़ा हुआ विश्वास है।

अनुशासनात्मक पहल का स्पष्ट प्रभाव

जिले के एसएसपी शशि मोहन सिंह की कार्यशैली इस पूरे घटनाक्रम में निर्णायक रही। उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि धार्मिक आस्था के नाम पर किसी भी प्रकार की अव्यवस्था या दबंगई को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने त्योहार से पहले कुछ रणनीति तैयार की जिसमें असामाजिक तत्वों की पहचान, संभावित उपद्रवियों पर अग्रिम कार्रवाई, आयोजकों के साथ संवाद और जिम्मेदारी तय करना साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी प्रमुख रहा। इन सभी कदमों ने मिलकर एक ऐसा वातावरण तैयार किया, जहां अनुशासन स्वाभाविक रूप से दिखाई दिया। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल “कंट्रोल” की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि “प्रिवेंटिव पुलिसिंग” का एक प्रभावी उदाहरण थी।

सामाजिक सौहार्द का सशक्त संदेश

रायगढ़ की इस शोभायात्रा ने यह भी साबित किया कि जब माहौल निष्पक्ष और सुरक्षित हो, तो समाज अपने आप एकजुट होकर आगे आता है। व्यापारी वर्ग, जो पहले आशंकित रहता था इस बार स्वागत में आगे आया। आम नागरिकों ने न केवल सहभागिता की, बल्कि इसे एक उत्सव के रूप में जिया। यह सामाजिक सौहार्द किसी आदेश से नहीं आता यह विश्वास से आता है और यह विश्वास तभी बनता है, जब प्रशासन निष्पक्ष, सक्रिय और दृढ़ दिखाई देता है। 

शक्ति प्रदर्शन से संस्कार तक

पिछले वर्षों में ऐसे आयोजनों के दौरान हथियारों का प्रदर्शन और दबंगई एक चिंताजनक प्रवृत्ति बन चुकी थी। यह न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती थी, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित करती थी। इस बार इन प्रवृत्तियों का पूरी तरह अभाव रहा। यह बदलाव केवल पुलिस की सख्ती का परिणाम नहीं, बल्कि उस स्पष्ट नीति का परिणाम है, जिसमें यह तय कर दिया गया कि आस्था का मंच केवल श्रद्धा और संस्कृति के लिए है, शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं।

एक अनुकरणीय मॉडल

रायगढ़ का यह अनुभव केवल एक शहर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह एक मॉडल के रूप में सामने आया है, जहां प्रशासन की दृढ़ता, पुलिस की रणनीतिक सक्रियता और समाज की सकारात्मक भागीदारी, तीनों मिलकर एक स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण का निर्माण करते हैं। एसएसपी शशि मोहन सिंह की पहल इस संदर्भ में सराहनीय ही नहीं, बल्कि प्रेरणादायक भी है। उन्होंने यह दिखाया कि सख्ती और संवेदनशीलता साथ-साथ चल सकती हैं और जब ऐसा होता है, तब कानून केवल डर का माध्यम नहीं, बल्कि भरोसे का आधार बनता है। रायगढ़ की इस रामनवमी ने एक महत्वपूर्ण संदेश भी दिया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति स्पष्ट हो और समाज उसका साथ दे, तो किसी भी परंपरा को उसकी वास्तविक गरिमा के साथ निभाया जा सकता है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस पहल को निरंतरता मिले, ताकि कानून का यह भरोसा और सामाजिक सौहार्द आने वाले समय में और मजबूत हो सके।

कैमरे की कलम: जंगल, कानून और ‘मूल्य’ की विडंबना


जंगलों को अक्सर “कानून से परे” नहीं, बल्कि “कानून के भीतर संरक्षित” माना जाता है। यही वह जगह है जहां नियम सबसे सख्त होने चाहिए क्योंकि यहां दांव पर केवल पेड़ नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी, वन्यजीवन और भविष्य की पीढ़ियों का संतुलन होता है लेकिन जब इन्हीं कानूनों के संरक्षक, उनके अर्थ का मूल्य तय करने लगें, तो सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि नैतिक विघटन का भी हो जाता है। 

हालिया मामले में अचानकमार टाइगर रिजर्व के सुरही रेंज में पदस्थ रेंजर पल्लव नायक और डिप्टी रेंजर मनीष श्रीवास्तव पर 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े जाने का आरोप इसी विडंबना को उजागर करता है। आरोप यह है कि उन्होंने एक प्रकरण में चालान जल्दी पेश करने और जब्त वाहन छोड़ने के एवज में रिश्वत मांगी। पहली नजर में यह एक “रूटीन भ्रष्टाचार” जैसा लग सकता है। एक और ट्रैप, एक और गिरफ्तारी, एक और मामला। लेकिन अगर इस घटना को जंगल और वन्यजीवन की दृष्टि से देखा जाए, तो इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा और चिंताजनक हो जाता है।

जंगल का कानून अपने आप में अनूठा होता है। यह सिर्फ कागज पर लिखे नियमों का समूह नहीं, बल्कि एक नैतिक अनुशासन है जिसमें मनुष्य को स्वयं को सीमित रखना होता है ताकि प्रकृति अपना संतुलन बनाए रख सके। जब कोई व्यक्ति जंगल में प्रवेश करता है, तो वह केवल एक स्थान में नहीं, बल्कि एक व्यवस्था में प्रवेश करता है, जहां हर पेड़, हर जीव, हर ध्वनि का अपना महत्व है। ऐसे में, जो लोग इस व्यवस्था की रक्षा के लिए नियुक्त किए जाते हैं, उनसे अपेक्षा होती है कि वे इस अनुशासन के सबसे बड़े संरक्षक होंगे लेकिन जब यही संरक्षक “नियमों की कीमत” तय करने लगें, तो सवाल उठता है क्या जंगल का कानून भी अब मोलभाव का विषय बन चुका है?

इस मामले में जिस तरह से कथित रूप से लाखों रुपये की बात की गई और फिर 70 हजार रुपये में “समाधान” तलाशा गया, वह केवल एक लेन-देन नहीं, बल्कि एक सोच का प्रतिबिंब है। यह सोच बताती है कि कानून को एक सेवा के रूप में देखा जा रहा है—जहां नियमों का पालन नहीं, बल्कि उनका “प्रबंधन” किया जाता है। और यह प्रबंधन अक्सर उन लोगों के पक्ष में झुक जाता है, जो इसकी कीमत चुका सकते हैं।

कल्पना कीजिए एक हिरण, जो अपनी सुरक्षा के लिए कानून पर निर्भर है, लेकिन कानून की ‘कीमत’ तय हो चुकी है। या एक पेड़, जो कटने से पहले यह नहीं पूछ सकता कि उसकी रक्षा के बदले कितनी रकम तय हुई है। जंगल न तो सौदे समझता है, न रसीदें। वह सिर्फ संतुलन जानता है और वही संतुलन सबसे पहले टूटता है। एक हिरण जो जंगल में निर्भय होकर दौड़ना चाहता है, उसे क्या फर्क पड़ता है कि किसी फाइल में क्या लिखा है या किसने कितनी राशि दी? एक पक्षी, जो अपने घोंसले के लिए सुरक्षित पेड़ ढूंढ रहा है, उसे क्या पता कि उस पेड़ की सुरक्षा किसी “समझौते” का हिस्सा बन चुकी है? जंगल की दुनिया में न तो रिश्वत का कोई अर्थ है, न ही कोई वैधता। 

इस तरह की घटनाएं केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का उदाहरण नहीं हैं; वे उस व्यापक मानसिकता की ओर इशारा करती हैं, जिसमें सार्वजनिक जिम्मेदारियों को निजी अवसरों में बदल दिया जाता है। यह मानसिकता केवल वन विभाग तक सीमित नहीं है, लेकिन जंगलों के संदर्भ में इसका प्रभाव कहीं अधिक गंभीर होता है। क्योंकि यहां नुकसान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पारिस्थितिक होता है जो अक्सर अपूरणीय होता है।

अचानकमार जैसे संरक्षित क्षेत्र केवल भौगोलिक सीमाएं नहीं हैं; वे संरक्षण के प्रतीक हैं। यहां हर नियम, हर प्रतिबंध, हर निगरानी का उद्देश्य एक ही होता है। प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में बनाए रखना लेकिन जब इन नियमों को लागू करने वाले ही उन्हें “लचीला” बना दें, तो संरक्षण की पूरी अवधारणा ही कमजोर पड़ने लगती है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस मामले की शुरुआत एक सोशल मीडिया रील से हुई। एक ऐसी दुनिया से, जहां दृश्यता अक्सर जिम्मेदारी से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। एक रील, एक वायरल वीडियो, और उसके बाद की कार्रवाई यह क्रम अपने आप में आधुनिक समय की एक कहानी कहता है लेकिन इस कहानी का सबसे चिंताजनक हिस्सा वह है, जहां कार्रवाई के बाद भी “समाधान” के लिए रिश्वत का रास्ता अपनाया गया।

यहां एक और सवाल उठता है क्या कानून का भय अब केवल औपचारिकता बनकर रह गया है? अगर कोई व्यक्ति यह मानकर चलता है कि नियमों को पैसे के जरिए “समायोजित” किया जा सकता है, तो यह केवल उस व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। यह हमें हमारी ही बनाई हुई व्यवस्था का प्रतिबिंब दिखाता है जहां हम एक तरफ जंगलों की रक्षा की बात करते हैं और दूसरी तरफ उनके नियमों को कमजोर करने वाली प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। यह आईना हमें यह भी दिखाता है कि भ्रष्टाचार केवल एक लेन-देन नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जो धीरे-धीरे संस्थाओं को भीतर से खोखला कर देती है लेकिन इस अंधेरे चित्र के बीच एक सकारात्मक पहलू भी है—कार्रवाई। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की इस ट्रैप कार्रवाई ने यह संकेत दिया है कि व्यवस्था में अभी भी ऐसे तंत्र मौजूद हैं, जो जवाबदेही सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह एक जरूरी याद दिलाता है कि कानून केवल लागू करने वालों तक सीमित नहीं है; उसे लागू कराने वाले भी हैं।

फिर भी, सवाल बना रहता है क्या ऐसी कार्रवाइयां पर्याप्त हैं? या हमें उस मानसिकता को बदलने की जरूरत है, जो ऐसे मामलों को जन्म देती है? शायद समाधान केवल सख्त कानूनों या अधिक निगरानी में नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक चेतना में है। जब तक हम सार्वजनिक पदों को “सेवा” के बजाय “सुविधा” के रूप में देखेंगे, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। और जब तक जंगलों को केवल संसाधन के रूप में देखा जाएगा, तब तक उनकी रक्षा केवल कागजों तक सीमित रहेगी। अंततः, यह मामला हमें एक असहज लेकिन जरूरी सवाल के साथ छोड़ता है क्या हम अपने जंगलों की रक्षा उन लोगों के भरोसे छोड़ सकते हैं, जिनके लिए कानून एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक विकल्प बन चुका है?

जंगल का मौन बहुत कुछ कहता है। वह हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति के नियम किसी सौदे का हिस्सा नहीं हो सकते। वे या तो पालन किए जाते हैं, या फिर उनके टूटने की कीमत चुकानी पड़ती है और यह कीमत अक्सर उन लोगों को चुकानी पड़ती है, जिनकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है। शायद अब समय आ गया है कि हम यह तय करें क्या हम जंगलों को बचाना चाहते हैं, या केवल उनके नाम पर चलने वाले सौदों को?

पश्चिम एशिया की परिस्थितियों के मद्देनज़र कमिश्नर-आईजी ने ली समीक्षा बैठक


बिलासपुर। 
TODAY छत्तीसगढ़  /  पश्चिम एशिया में उत्पन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुरूप  संभागीय कमिश्नर श्री सुनील जैन एवं आईजी श्री रामगोपाल गर्ग ने मंथन सभाकक्ष में समीक्षा बैठक लेकर कलेक्टर पुलिस अधीक्षक तथा तेल कंपनियों के अधिकारियों, डीलरों एवं वितरकों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। कलेक्टर संजय अग्रवाल, एसएसपी रजनेश सिंह सहित अन्य अधिकारी बैठक में उपस्थित थे।

बैठक में कमिश्नर श्री सुनील जैन ने पेट्रोलियम उत्पादों, एलपीजी गैस, उर्वरकों एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था की विस्तार से समीक्षा की । अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि बिलासपुर सहित पूरे संभाग में इन वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए तथा किसी भी प्रकार की कमी की स्थिति उत्पन्न न होने दी जाए। कमिश्नर श्री जैन ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में अफवाहों पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है। आमजन तक सही एवं तथ्यात्मक जानकारी समय पर पहुंचाई जाए तथा सोशल मीडिया सहित अन्य माध्यमों पर भ्रामक खबरों की सतत निगरानी रखते हुए उनका तत्काल खंडन किया जाए।

कंट्रोल रूम सक्रिय रखें, 1800-233-3663 का व्यापक प्रचार करें

बैठक में निर्देश दिए गए कि राज्य स्तरीय कंट्रोल रूम नंबर 1800-233-3663 का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। साथ ही प्रत्येक जिले में कंट्रोल रूम को सक्रिय रखते हुए प्राप्त शिकायतों एवं सूचनाओं का त्वरित निराकरण सुनिश्चित किया जाए।

कालाबाजारी और जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई

कमिश्नर ने स्पष्ट निर्देश दिए कि पेट्रोल, डीजल, गैस सिलेंडर सहित आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी या जमाखोरी करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। पेट्रोल पंपों एवं गैस एजेंसियों के स्टॉक और वितरण की नियमित जांच सुनिश्चित की जाए। कमिश्नर ने निर्देशित किया  कि उर्वरकों की होल्डिंग पर रोक लगाई जाए तथा किसानों को उनकी आवश्यकता के अनुरूप समय पर खाद उपलब्ध कराया जाए। दैनिक स्टॉक की निगरानी कर वितरण व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए। अस्पतालों, छात्रावासों, शैक्षणिक संस्थानों, रेलवे एवं अन्य आवश्यक सेवाओं में गैस और ईंधन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

सीमावर्ती क्षेत्रों में बढ़ाई जाए निगरानी

आईजी श्री गर्ग ने निर्देश दिए कि सीमावर्ती चेक पोस्टों पर विशेष सतर्कता बरती जाए। गैस सिलेंडरों एवं पेट्रोल-डीजल के परिवहन पर कड़ी नजर रखी जाए तथा अवैध रूप से कंटेनरों में ईंधन बिक्री पर रोक लगाई जाए। बैठक में तेल कंपनियों के अधिकारियों ने बताया कि संभाग में पेट्रोलियम पदार्थों एवं गैस की पर्याप्त उपलब्धता है तथा आपूर्ति सामान्य रूप से जारी है। अंत में कमिश्नर एवं आईजी ने सभी अधिकारियों को टीम भावना से कार्य करते हुए आमजन को निर्बाध सेवाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

CBN 36 ने खोला नया कार्यालय, डिजिटल पहुंच बढ़ाने की दिशा में कदम


बिलासपुर।
 TODAY छत्तीसगढ़  /  अग्रसेन चौक स्थित कुबेर प्लाजा में हिंदी डिजिटल समाचार पोर्टल CBN 36 के नए कार्यालय का शुक्रवार को विधिवत उद्घाटन किया गया। पोर्टल के संपादक राहुल शुक्ला ने फीता काटकर नए परिसर में प्रवेश किया और भगवान गणेश व मां सरस्वती के चित्रों पर पुष्प अर्पित कर पूजा-अर्चना की। यह कार्यालय  है। 

उद्घाटन समारोह सादगी और औपचारिकता के साथ आयोजित किया गया, जिसमें पत्रकारिता और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों ने इसे डिजिटल पत्रकारिता के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

इस अवसर पर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार रवि शुक्ला, सत्यप्रकाश पांडेय और सौरभ सिंह समेत कई प्रमुख लोग मौजूद रहे । अतिथियों ने अपने संबोधन में कहा कि बदलते समय में डिजिटल मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ रही है और ऐसे में विश्वसनीय समाचार प्लेटफॉर्म की आवश्यकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

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