बिलासपुर: TODAY छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ विधानसभा से पारित विभिन्न विधेयकों पर राज्यपाल की मंजूरी लंबित रहने से जुड़े मामले में लगभग तीन वर्ष बाद शुक्रवार को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि वह इस मामले में दायर अपनी याचिका वापस लेना चाहती है। वहीं, आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता संत कुमार नेताम ने अपनी याचिका जारी रखते हुए लंबित विधेयकों पर निर्णय कराने की मांग दोहराई।
न्यायमूर्ति ए.के. प्रसाद की एकलपीठ के समक्ष हुई सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने कहा कि सरकार अपनी याचिका वापस लेना चाहती है। इसके लिए औपचारिक आवेदन दाखिल करने हेतु समय देने का अनुरोध किया गया।
याचिकाकर्ता बोले- सुप्रीम कोर्ट ने तय कर दी है सीमा
संत कुमार नेताम की ओर से अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने अदालत को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ स्पष्ट कर चुकी है कि राज्यपाल किसी भी विधेयक को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते। ऐसे में उनकी ओर से याचिका वापस नहीं ली जाएगी।
उन्होंने विशेष रूप से राज्य में आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने संबंधी विधानसभा से पारित विधेयक पर शीघ्र निर्णय कराने की मांग की।
हाई कोर्ट ने सरकार को दिया दो सप्ताह का समय
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को अपनी याचिका वापस लेने के लिए औपचारिक आवेदन प्रस्तुत करने हेतु दो सप्ताह का समय दिया। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई होगी।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के फैसले की प्रति भी अदालत में प्रस्तुत की जाएगी।
कई अहम विधेयक अब तक लंबित
गौरतलब है कि वर्ष 2018 से 2023 के बीच तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में विधानसभा से पारित कई विधेयकों पर राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिल सकी थी। इनमें राज्य में आरक्षण बढ़ाने संबंधी विधेयक के अलावा कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर चंदूलाल चंद्राकर विश्वविद्यालय करने संबंधी विधेयक भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
अन्य राज्यों में भी इसी तरह के विवाद सामने आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने इस विषय पर विस्तृत सुनवाई की थी। अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते। उन्हें संविधान के अनुरूप उचित समय के भीतर निर्णय लेना होगा। वे विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को लौटा सकते हैं या राष्ट्रपति के विचारार्थ भेज सकते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 200 का उल्लेख करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि विधानसभा किसी विधेयक को पुनर्विचार के बाद दोबारा पारित कर देती है, तो राज्यपाल उसे अनिश्चितकाल तक रोककर नहीं रख सकते। साथ ही, यदि लंबे समय तक किसी विधेयक पर निर्णय नहीं लिया जाता है तो प्रभावित पक्ष न्यायालय का रुख कर सकते हैं।
क्यों अहम है यह मामला?
संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार विधानसभा से पारित कोई भी विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति मिलने के बाद ही कानून बनता है। ऐसे में राज्यपाल के पास लंबे समय तक विधेयकों के लंबित रहने का मुद्दा संवैधानिक और कानूनी बहस का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। 

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