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'माँ' वेंटीलेटर पर, बेटे रूपये बटोर रहे

[TODAY छत्तीसगढ़] / अब हर मौसम में [बारिश छोड़ दें] सूखी बेजान नजर आने वाली अरपा की यह दारुण दशा उद्गम से लेकर संगम तक 147 किलोमीटर के लंबे सफर में पड़ने वाले गांव, कस्बे और शहरी आबादी की चिंता का विषय बन गई है। पेंड्रा के अमरपुर के खेत से निकली अरपा पिछले दो दशक से वेंटीलेटर पर है, उद्गम सूख चुका है। आबादी के विस्तार के साथ उपजे अतिक्रमण, अवैध कटाई, अंधाधुंध उत्खनन के चलते उसका साइड इफेक्ट अब शहर में भी नजर आने लगा है। नदी की ये हालत देखकर कुछ पुराने पानीदार लोगों की आँखों में अरपा का पुराना वैभव झूल जाता है। मूल बात यह है कि जिस नदी ने सभ्यता और संस्कृति को जीवंत रखा, उसके अस्तित्व को बचाना होगा और इस चुनौती से निबटने के लिए सरकार और आमजन को साथ साथ काम करना होगा।
करीब डेढ़ दशक पहले तक बारिश के दिनों में बाढ़ के साथ चमकदार रेत बहाकर अरपा साथ-साथ लिए आगे संगम की ओर बढ़ती चली जाती थी । अब रेत की जगह पठार, मरुस्थल नजर आता है। जानकारों की मानें तो एक वक्त वो भी था जब पहाड़ी नदी अरपा के उद्गम से पतली सी धार गर्मियों में भी बहा करती थी। अरपा में पानी उसके कैचमेंट एरिया से आता है, जो उसे आकार प्रदान करता है । संगम तक तटवर्ती क्षेत्रों का जल स्तर नदी के चलते बना रहता है। निस्तार, पेयजल और सिंचाई के लिए ट्यूबवेल के बेहताशा उत्खनन के चलते अंत:सलिला की जान सांसत में है। अगर बिलासपुर शहर की बात करें तो अरपा की कोख को रौंदने और उसके सीने को छलनी कर रेत छानने वाले कोई गैर नहीं बल्कि उसी अरपा के बेटे हैं जो दिन के उजाले में 'माँ' [अरपा] को बचाने की वकालत करते हैं और घात लगाकर उसी माँ के अस्तित्व को मिटाने रात-दिन बड़ी-बड़ी मशीने उसकी छाती पर चलाकर आर्थिक सम्पन्नता का तिलक माथे पर लगाए घूम रहे हैं। अरपा करीब-करीब मर ही गई है, उसकी कोख से निकले खनिज, रेत में हिस्सेदारी सबकी है लिहाजा खुलकर कोई बोलना नहीं चाहता। बिलासपुर के शिवघाट, घुटकू, सेंदरी, कछार, लमेर घाट से रात दिन रेत उत्खनन जारी है। नदी का अस्तित्व और स्वरुप दोनों बदल चुका है।   
 रेत पर सजता था सांस्कृतिक मंच -
1996 लगते साथ अरपा की रेत पर पहली बार नई शुरुआत की गई। साहित्यकार स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के नाम पर गठित समिति ने अरपा महोत्सव का आयोजन किया। नदी किनारे की ठंड कड़ाके की होती है, परंतु उम्दा सांस्कृतिक आयोजन और मेले, ठेले का सरंजाम होने के कारण लोगों ने इसका जमकर लुत्फ उठाया। आयोजन के सूत्रधार तत्कालीन मंत्री बीआर यादव, रामबाबू सोंथलिया(दोनों अब स्वर्गीय) जैसे लोग थे। कुछ सालों तक यह अनूठा आयोजन चर्चाओं में भी रहा। अविभाजित मध्यप्रदेश में इसकी खूब धूम मची रही, परंतु बाद में इसके आयोजन पर विराम लग गया। ये कुछ ऐसे लोग थे जो अरपा को माँ कहते थे, वो अपने बेटे होने का कर्तव्य भी निभाते थे। कहते हैं 'भगीरथ' धरती पर लोगों के कल्याण के लिए गंगा को लेकर आये । अमरकंटक की नर्मदा भगवान शिव के स्वेद से उत्पन्न हुई और अरपा अन्न उपजाने वाले खेत से निकली। आप समझ सकते हैं कि अरपा जिले भर के लिए साक्षात अन्नपूर्णा से कम नहीं है लेकिन आज अरपा की कहानी दुखांत मोड़ पर पहुंच गई है। उसकी यह दशा उस पर आश्रित आबादी ने की है।
 डोंगाघाट से होता था व्यापार -
इतिहासकार बताते हैं बिलासपुर को बिलासा केंवटिन ने बसाया, लेकिन शहर बसने से पहले अरपा के तटवर्ती गांवों पर कई डोंगाघाट थे। वस्तुओं का आदान प्रदान इन्हीं के जरिए होता था। किसान अपनी उपज धान, चावल, तिवरा, कोदो, कुटकी, गन्ना, चना, मसूर, धनिया, सब्जियां, घी, दूध, चार, तेंदू, महुआ आदि के बदले जूना बिलासपुर से नमक, तेल, गुड़, कपड़े,सोने, चांदी, लोहे के सामान आदि का क्रय विक्रय करते थे। अरपा के तटवर्ती डोंगाघाट कोनी, चांटीडीह, जूना बिलासपुर, तोरवा दर्रीघाट और लालखदान के घाटों की नीलामी की जाती थी। इससे राजकीय कर प्राप्त होता था। अरपा नदी के डोंगाघाट एक व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित थे। अरपा नदी बिलासपुर से नीचे बहकर शिवनाथ नदी में मिल जाती है। शिवनाथ महानदी में और महानदी पश्चिम बंगाल की खाड़ी(महासागर) में मिलती है। जल मार्ग से बिलासपुर, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल से व्यापारिक संबंध थे। TODAY छत्तीसगढ़ के WhatsApp ग्रुप में जुड़ने के लिए क्लिक करें
कभी घाट की संस्कृति ज़िंदा थी -
अरपा में घाट की संस्कृति आबादी, बसाहट की तरह सैकड़ों साल पुरानी है। घाट व्यवस्था सामाजिक तौर पर की जाती थी। बिलासपुर शहर की बात करें तो पचरीघाट के पास जनकबाई घाट अपनी पुरातन संस्कृति की याद आज भी दिलाती है। हालांकि इसके लोकार्पण का पत्थर अब गायब हो चुका है। वक्त के निर्मम थपेड़ों ने घाट को जीर्ण जीर्ण दशा में पहुंचा दिया है। ब्रितानीराज में इसकी स्थापना शंकर राव बापते, गोविंद राव बापते(अब स्वर्गीय) के परिवार ने की। जूना बिलासपुर में रहने वाले रामदुलारे रजक ने TODAY छत्तीसगढ़ को बताया की इसके लोकार्पण पर अरपा तट की साज सज्जा की तस्वीर बापते परिवार के पास वर्षों तक रही। दिनचर्या से लेकर समस्त संस्कारों के दौरान जमाने से जनकबाई घाट एक समाज के मिलन स्थल बने रहे। पचरीघाट जूना बिलासपुर की स्थाई पहचान बन चुका है। ऐसे कइयों घाट हैं अरपा किनारे जिसने सालों साल  लोगों को मिलाने का काम किया, इन घाटों से तहजीब और तमीज की कई पीढ़ियां संस्कारित होती रही लेकिन अब इन घाटों के किनारे माँ की कोख खोदने और उसकी उखड़ चुकी साँसों पर मशीने चलाने वाले माफिया राज कर रहें हैं।


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