उत्तरप्रदेश में एक बहुत चर्चित, और मशहूर रही आईएएस अफसर बी.चन्द्रकला पर सीबीआई का छापा पड़ा है जिसे कुछ पार्टियों ने उत्तरप्रदेश में अखिलेश सरकार के वक्त के कुछ मामलों से जोड़कर राजनीतिक मकसद से डाला गया छापा कहा है। दूसरी तरफ सीबीआई का तर्क यह है कि चन्द्रकला ने बिना कर्ज लिए 22 लाख रूपए की एक जमीन खरीदी थी। अब एक लाख रूपए महीने की तनख्वाह वाली अधिकारी की अगर यह खरीदी सीबीआई छापे की अकेली वजह है तो अलग बात है, वरना यह बात कुछ अटपटी लगती है। सीबीआई इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश पर अवैध खनन घोटाले की जांच कर रही है, और उसमें इस महिला अफसर को भी आरोपों का सामना करना पड़ रहा है।
लेकिन इस एक मामले से परे अगर देखें तो कुछ खबरें ऐसा भी बताती हैं कि यह अफसर सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरों के लिए अतिचर्चित रही है, और उसने हर कुछ देर में अपनी फोटो पोस्ट करने के लिए कर्मचारी भी रखे हुए हैं। सोशल मीडिया पर अपने अकाउंट को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए भुगतान करके भी उसने लोकप्रियता पाई है, ऐसी भी खबरें हैं। हमने छत्तीसगढ़ में भी कुछ समय पहले ऐसे अफसर देखे हैं जो कि सरकारी कुर्सी पर रहते हुए भी फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर भुगतान करके अपने पेज को अधिक लोगों तक पहुंचाते थे, और जिस तरह कोई नेता तारीफ खरीदते हैं, उस तरह अफसर भी तारीफ खरीदते थे। यह सिलसिला राजनीति से शुरू होकर कब शासन-प्रशासन में पहुंच गया, पता ही नहीं चला। पिछले साढ़े चार बरस में भाजपा ने लगातार अपने सांसदों, विधायकों, और बाकी नेताओं के लिए सोशल मीडिया पर मौजूदगी और लोकप्रियता की शर्तें लादी थीं, और इसके लिए लोग भुगतान करके फर्जील लोकप्रियता भी खरीदते थे। पार्टी की उम्मीदवारी के लिए भी इसे एक अनिवार्य शर्त बताया गया था, और धीरे-धीरे अफसरों ने भी ऐसा करना शुरू कर दिया।
अधिकारियों की निजी प्रचार की चाह खतरनाक होते जाती है। वह धीरे-धीरे सरकारी जिम्मेदारियों से ऊपर अपनी लोकप्रियता को बिठा देती है, और जिस तरह राजनीति में लोग व्यक्तित्व के करिश्मे को स्थापित करने में लगते हैं, उसी तरह प्रशासन में भी लोग करने लगे हैं। हालांकि सीबीआई का यह छापा इस अफसर के मशहूर होने की वजह से नहीं है, लेकिन इस अफसर पर छापा बड़ी खबर इसीलिए बना है, और इसीलिए हम अफसरी के इस पहलू पर लिख रहे हैं। नेताओं के आभा मंडल में आगे बढऩे के लिए बहुत से अफसर सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ता की तरह गलत कामों में हिस्सेदार हो जाते हैं, और ऐसे कुछ मामले अभी छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में भी सामने आ रहे हैं। उत्तरप्रदेश से ऐसी चर्चा है कि इस महिला अफसर ने अखिलेश सरकार के वक्त इसी तरह सत्तारूढ़ राजनीति के साथ कदमताल किया था।
अगर सचमुच ही ऐसा गलत किया गया है, तो इस पर कार्रवाई एक मिसाल बननी चाहिए ताकि अफसरों को यह समझ आए कि न तो राज्य में किसी एक पार्टी की सरकार हमेशा नहीं बनी रहती, और न ही केन्द्र की सरकार उसी पार्टी की रहना जरूरी होता है। ऐसे में राजनीतिक नीयत से कई अफसरों पर कार्रवाई हो सकती है, और यह भी हो सकता है कि उन्हें मिला हुआ राजनीतिक संरक्षण खत्म हो जाए, और वे ईमानदार नीयत से शुरू जांच और कार्रवाई के घेरे में आ जाएं। इसलिए देश की नौकरशाही को कमाई करने के लिए, या चर्चित होने के लिए सत्तारूढ़ दल के साथ ऐसी भागीदारी नहीं करना चाहिए।

