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कैमरे की कलम: जब ‘अंपायर’ पर उठे सवाल

भारत में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक के विश्वास की सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति भी हैं। इसलिए चुनाव कराने वाली संस्था—निर्वाचन आयोग—की निष्पक्षता पर उठने वाला हर सवाल स्वाभाविक रूप से गंभीर हो जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की ताजा टिप्पणी इसी व्यापक चिंता को सामने लाती है।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर केरल के पूर्व मुख्य सचिव और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी जिजी थॉमसन के हालिया दावे का हवाला देते हुए ज्ञानेश कुमार पर तीखा राजनीतिक हमला किया है। गांधी ने आरोप लगाया कि एक समय ज्ञानेश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी के लिए लोगों को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया और बाद में उन्हें देश के चुनावों का 'अंपायर' बना दिया गया। अपने पोस्ट में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर भी गंभीर आरोप लगाए और चुनावों में 'मैच फिक्सिंग' की बात कही।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राहुल गांधी का बयान एक राजनीतिक आरोप है, जबकि उसके पीछे जिस घटना का हवाला दिया जा रहा है, वह जिजी थॉमसन का व्यक्तिगत दावा है। इसलिए दोनों को स्थापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि आरोप और उसके स्रोत के रूप में देखना जरूरी है। जिजी थॉमसन ने 'ऑनमनोरमा' को दिए साक्षात्कार में दावा किया कि वर्ष 2016 में दिल्ली की यात्रा के दौरान एक विमान में उनकी तत्कालीन आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार से बातचीत हुई थी। उस समय थॉमसन केरल के मुख्य सचिव थे और कुमार भी सरकारी सेवा में थे। थॉमसन के मुताबिक दोनों के बीच मित्रतापूर्ण संबंध थे। थॉमसन का कहना है कि बातचीत के दौरान ज्ञानेश कुमार ने उनसे सेवानिवृत्ति के बाद की योजना के बारे में पूछा। जब उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई विशेष योजना नहीं बनाई है, तब कुमार ने उन्हें 2019 का लोकसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में लड़ने का सुझाव दिया। थॉमसन के अनुसार, उन्हें पथानामथिट्टा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की बात कही गई थी। उनका दावा है कि कुमार ने यह भी कहा था कि चुनाव जीतने के बाद उनके सांसद बनने और आगे चलकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना हो सकती है। थॉमसन ने कथित प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। थॉमसन ने यह भी कहा कि यह पहली बार नहीं था जब कुमार ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया था। उनके अनुसार, इससे पहले भी जब कुछ लोगों ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए संपर्क किया था, तब कुमार को इसकी जानकारी हुई और उन्होंने उन्हें राजनीति में प्रवेश करने के लिए समझाने की कोशिश की थी।

यह दावा इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जिस व्यक्ति के बारे में यह बात कही जा रही है, वह आज भारत के चुनाव आयोग के शीर्ष पद पर है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है—इस बातचीत का स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण या ज्ञानेश कुमार की ओर से इस दावे पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आना अलग प्रश्न है। अतः केवल इस बयान के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

राहुल गांधी ने इस दावे को निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर पहले से जारी राजनीतिक बहस से जोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति पर अतीत में भाजपा के लिए उम्मीदवार तलाशने या किसी को चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित करने का आरोप लगा हो, वही व्यक्ति यदि बाद में देश की चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करने वाली संवैधानिक संस्था का प्रमुख बनता है, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

गांधी ने अपनी टिप्पणी में 'अंपायर' और 'मैच फिक्सिंग' जैसे क्रिकेट के रूपकों का इस्तेमाल किया। राजनीतिक भाषा में इस तरह के रूपक आरोप की गंभीरता को रेखांकित करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन इन्हें तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। 'मैच फिक्सिंग' का आरोप अपने आप में एक गंभीर राजनीतिक आरोप है, जिसे सिद्ध करने के लिए ठोस प्रमाण और स्वतंत्र जांच की आवश्यकता होगी।

यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक बयान और संस्थागत प्रश्न अलग-अलग हो जाते हैं। राहुल गांधी क्या आरोप लगा रहे हैं, यह एक राजनीतिक तथ्य है; लेकिन क्या निर्वाचन आयोग वास्तव में किसी राजनीतिक दल के पक्ष में काम कर रहा है, यह एक अलग और प्रमाण-आधारित प्रश्न है।

ज्ञानेश कुमार को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि इससे व्यापक है। हाल के महीनों में निर्वाचन आयोग के कामकाज, विशेषकर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR), को लेकर विपक्षी दलों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के भीतर ज्ञानेश कुमार के कुछ निर्णयों और आदेशों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। विपक्ष ने इन रिपोर्टों को आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया है। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को अलग ढंग से प्रस्तुत किया है। आयोग का कहना है कि संस्थागत विचार-विमर्श में अलग-अलग राय और टिप्पणियां असामान्य नहीं हैं और उसके हालिया आदेश पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। भारतीय जनता पार्टी की ओर से भी विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा गया है कि आयोग के भीतर मतभेद होना इस बात का संकेत हो सकता है कि संस्थागत विचार-विमर्श हो रहा है। यानी इस पूरे विवाद में तीन अलग-अलग स्तर हैं—विपक्ष के आरोप, आयोग का स्पष्टीकरण और अब जिजी थॉमसन का व्यक्तिगत अनुभव। इन तीनों को एक ही श्रेणी में रखकर देखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसके फैसले कानूनी रूप से सही हैं या नहीं। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि जनता और राजनीतिक दलों को उसकी निष्पक्षता पर भरोसा हो। मुख्य चुनाव आयुक्त का पद इसलिए सामान्य प्रशासनिक पद नहीं है। चुनाव कार्यक्रम से लेकर मतदाता सूची, मतदान प्रक्रिया और चुनाव परिणामों की घोषणा तक, आयोग के निर्णय करोड़ों नागरिकों और सभी राजनीतिक दलों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में आयोग के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति की राजनीतिक निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा होना अपने आप में संस्थागत चुनौती बन जाता है लेकिन इसी कारण आरोपों की जांच भी उतनी ही निष्पक्ष होनी चाहिए। यदि किसी पूर्व नौकरशाह का दावा है कि एक तत्कालीन सरकारी अधिकारी ने उन्हें किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया था, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि उस बातचीत की पुष्टि के लिए क्या कोई अन्य साक्ष्य मौजूद है? क्या उस समय इसकी कोई सूचना, पत्राचार या अन्य रिकॉर्ड उपलब्ध था? क्या संबंधित व्यक्ति इस आरोप को स्वीकार करते हैं या उसका खंडन करते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर सार्वजनिक विमर्श को आरोप-प्रत्यारोप से निकालकर तथ्य और प्रमाण के धरातल पर ले जा सकते हैं।

इस विवाद का एक व्यापक पहलू नौकरशाही और राजनीति के संबंध से भी जुड़ा है। भारत में सेवानिवृत्त नौकरशाहों का सक्रिय राजनीति में जाना कोई नई घटना नहीं है। अनेक पूर्व अधिकारी विभिन्न राजनीतिक दलों में शामिल हुए हैं और चुनाव भी लड़े हैं, लेकिन किसी अधिकारी द्वारा सेवा में रहते हुए किसी राजनीतिक दल के लिए सक्रिय रूप से उम्मीदवार तलाशना या किसी संभावित उम्मीदवार को चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित करना—यदि ऐसा वास्तव में हुआ हो—तो यह एक अलग तरह का प्रश्न पैदा करता है। सरकारी सेवा में रहते हुए राजनीतिक निष्पक्षता और सेवा आचरण की सीमाएं महत्वपूर्ण होती हैं। इसलिए जिजी थॉमसन का दावा केवल इसलिए महत्वहीन नहीं हो जाता कि घटना कथित रूप से दस वर्ष पुरानी है। लेकिन दूसरी ओर, केवल एक दशक पुराने मौखिक दावे को निर्णायक प्रमाण मान लेना भी उचित नहीं होगा। दोनों बातों के बीच संतुलन बनाए रखना ही जिम्मेदार सार्वजनिक विमर्श की कसौटी है।

ज्ञानेश कुमार ने फरवरी 2025 में भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला था। वे 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं और केंद्र तथा केरल सरकार में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। अब जब उनके पुराने प्रशासनिक जीवन से जुड़ा यह दावा सामने आया है, तो स्वाभाविक रूप से उनकी नियुक्ति और चयन प्रक्रिया पर भी राजनीतिक बहस तेज होगी। हालांकि किसी व्यक्ति के अतीत में किसी अधिकारी से हुई कथित बातचीत और बाद में संवैधानिक पद पर उसकी नियुक्ति के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए अतिरिक्त प्रमाण आवश्यक होंगे। यही कारण है कि इस पूरे मामले में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता बन जाती है।

निर्वाचन आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव कराना नहीं है; बल्कि यह विश्वास बनाए रखना है कि चुनाव निष्पक्ष तरीके से कराए जा रहे हैं। यदि सत्ता पक्ष आयोग पर भरोसा करता है लेकिन विपक्ष नहीं, तो संस्थागत विवाद पैदा होता है। यदि विपक्ष आयोग पर आरोप लगाता है और आयोग उन आरोपों का विस्तृत, तथ्यात्मक और पारदर्शी जवाब नहीं देता, तो अविश्वास और गहरा सकता है। और यदि आयोग के भीतर ही निर्णयों को लेकर गंभीर मतभेद की खबरें सामने आती हैं, तो जनता के लिए स्थिति और जटिल हो जाती है। इसलिए मौजूदा विवाद को केवल राहुल गांधी बनाम ज्ञानेश कुमार या कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली सवाल इससे बड़ा है—क्या देश की चुनावी संस्था इतनी पारदर्शी और विश्वसनीय है कि उसके फैसलों पर राजनीतिक मतभेद के बावजूद व्यापक सार्वजनिक विश्वास कायम रह सके?

जिजी थॉमसन का दावा गंभीर है क्योंकि यह उस समय की बातचीत से जुड़ा है जब ज्ञानेश कुमार सरकारी सेवा में थे और थॉमसन के अनुसार उन्हें भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने का सुझाव दिया गया था। राहुल गांधी ने इसी दावे को आधार बनाकर निर्वाचन आयोग और उसके प्रमुख की निष्पक्षता पर तीखा हमला किया है लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि प्रमाण, जांच और पारदर्शी प्रक्रिया से निकलने चाहिए।

ज्ञानेश कुमार के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण चुनौती केवल विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक जवाब देना नहीं है। चुनौती यह भी है कि निर्वाचन आयोग के प्रत्येक निर्णय के पीछे की प्रक्रिया इतनी स्पष्ट हो कि उस पर अनावश्यक संदेह की गुंजाइश कम से कम हो क्योंकि चुनाव में हार-जीत किसी भी राजनीतिक दल की हो सकती है, लेकिन चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठे सवाल अंततः पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को प्रभावित करते हैं। इसलिए इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष न तो राहुल गांधी का बयान है और न ही जिजी थॉमसन का दावा। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत का मतदाता अपने चुनावी संस्थान पर बिना किसी राजनीतिक भय या संदेह के भरोसा कर सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर किसी राजनीतिक नेता को नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग की पारदर्शी कार्यप्रणाली, उपलब्ध प्रमाणों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही को देना होगा।

चाणक्य नीति - ईमानदारी से जीवन जीने वाला व्यक्ति हमेशा सम्मान पाता है।

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