बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि पति या ससुराल पक्ष के खिलाफ धारा 498ए के मामले में बरी होने मात्र से घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही खत्म नहीं होती। दोनों कानूनों का उद्देश्य और दायरा अलग-अलग है।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने मनोज कुटरे एवं अन्य बनाम सुनीता कुटरे एवं अन्य मामले में पति और ससुराल पक्ष की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।
मामले में सुनीता कुटरे ने चांपा के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में दहेज की मांग और मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए गए थे।
पति और ससुराल पक्ष ने हाईकोर्ट में शिकायत रद्द करने की मांग करते हुए दलील दी कि वे पहले ही आईपीसी की धारा 498ए के मामले में बरी हो चुके हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि 498ए के तहत आपराधिक मुकदमा और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मिलने वाली राहत को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट के मुताबिक 498ए मामले में बरी होने के तथ्य पर घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही के दौरान विचार किया जा सकता है, लेकिन सिर्फ बरी होने के आधार पर धारा 12 की शिकायत को शुरुआती स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।

