TODAY छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के प्रभाव में कमी आने के बाद बढ़ते अवैध शिकार और जंगलों में आग लगाने की घटनाओं को रोकने के प्रशासनिक उपायों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। रायपुर के एक पर्यावरण कार्यकर्ता ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर वर्तमान प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) सह वन बल प्रमुख (HoFF) के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि वन विभाग के शीर्ष अधिकारी ने ज़िला रिजर्व गार्ड (DRG) की तैनाती के संबंध में राज्य शासन द्वारा जारी स्पष्ट दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया, जिससे वन संरक्षण के एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव में अनावश्यक विलंब हुआ।
क्या है पूरा मामला?
शिकायतकर्ता नितिन सिंघवी के मुताबिक़, पिछले दिनों दंतेवाड़ा ज़िले के राजा बंगला क्षेत्र के घने जंगलों और पहाड़ियों में बड़े पैमाने पर अवैध शिकार की घटना सामने आई थी। आरोप है कि सैकड़ों की संख्या में शिकारियों ने वन्यजीवों को फंसाने के लिए जंगल में आग लगा दी थी। शिकारियों की बड़ी तादाद के आगे वन विभाग की मैदानी टीम असमर्थ साबित हुई और उन्हें पीछे हटना पड़ा।
सिंघवी का कहना है कि बस्तर क्षेत्र में नक्सली गतिविधियों में कमी आने के बाद अवैध शिकार, वनों में आग लगाने, अवैध कटाई और लकड़ी तस्करी के मामलों में तेज़ी आई है। इसी को देखते हुए उन्होंने मुख्य सचिव को सुझाव दिया था कि दंतेवाड़ा में उपलब्ध लगभग 1000 डीआरजी (DRG) जवानों को वन विभाग के साथ संयुक्त ऑपरेशन में लगाया जाए, ताकि वन अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सके।
राज्य शासन के निर्देश और पीसीसीएफ का क़दम
राज्य शासन ने इस सुझाव को गंभीरता से लेते हुए 7 मई 2026 को एक आदेश जारी किया था। इसके तहत:
संयुक्त प्रस्ताव की मांग: प्रधान मुख्य वन संरक्षक सह वन बल प्रमुख और तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को निर्देश दिया गया था कि वे इस प्रस्ताव का परीक्षण कर एक संयुक्त हस्ताक्षरयुक्त प्रस्ताव शासन को भेजें।
उद्देश्य: इस प्रस्ताव के आधार पर शासन स्वयं गृह विभाग से समन्वय स्थापित कर डीआरजी जवानों को वन विभाग के साथ संयुक्त ऑपरेशन में तैनात करने पर अंतिम फ़ैसला ले सके।
नितिन सिंघवी का आरोप है कि तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी)—जो अब वर्तमान में पीसीसीएफ सह वन बल प्रमुख हैं—ने शासन को सीधे प्रस्ताव भेजने के बजाय 9 जून 2026 को पुलिस महानिदेशक (DGP) को पत्र लिखकर इस संबंध में उनका अभिमत (ओपिनियन) मांग लिया।
कार्रवाई की मांग के पीछे का तर्क
मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में सिंघवी ने दलील दी है कि राज्य शासन ने अपने आदेश में कहीं भी वन विभाग को पुलिस महानिदेशक से सीधे राय लेने का निर्देश नहीं दिया था। यदि डीजीपी का अभिमत आवश्यक होता, तो शासन स्वयं गृह विभाग के माध्यम से इसे प्राप्त कर सकता था।
आरोप है कि शासन के निर्देशों से परे जाकर पुलिस विभाग से अभिमत मांगने के कारण न केवल आदेश का उल्लंघन हुआ, बल्कि बस्तर के संवेदनशील जंगलों की सुरक्षा से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले में एक महीने से अधिक का विलंब हो गया। सिंघवी का दावा है कि शासन के निर्देश स्पष्ट होने के बावजूद आज तक वह संयुक्त प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया गया है।
इन्हीं आधारों पर उन्होंने मुख्य सचिव से वर्तमान पीसीसीएफ सह वन बल प्रमुख के ख़िलाफ़ विभागीय नियमों की अनदेखी और वन संरक्षण के प्रति संवेदनहीनता बरतने के आरोप में अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। फिलहाल इस मामले में वन विभाग या संबंधित अधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है।
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