बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / बिलासपुर की साहित्यिक फिज़ा उस समय विशेष रूप से आलोकित हो उठी, जब रविवार, 29 मार्च को सी एम पी डी आई (CMPDI) के कम्युनिटी हॉल में अजीत सिंह गौर के प्रथम काव्य-संग्रह “रेत पर उकेरे जो शब्द” का गरिमामय विमोचन संपन्न हुआ। यह अवसर केवल एक पुस्तक के प्रकाशन का नहीं, बल्कि एक संवेदनशील रचनाकार के आत्मप्रकाश का उत्सव बन गया, जिसमें प्रदेश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, कवियों और बुद्धिजीवियों की स्नेहिल उपस्थिति ने आयोजन को सार्थकता प्रदान की। इस गरिमामय आयोजन में देश के प्रख्यात साहित्यकार सतीश जायसवाल, ख्यातिलब्ध कवि डॉक्टर अजय पाठक, जयप्रकाश, अशोक शर्मा, नीरज मंजीत, पद्मनाभ गौतम और दलजीत सिंह कालरा मौजूद रहे। पुस्तक विमोचन की इस यादगार संध्या में शहर के नामचीन चिकित्सक द्वय डॉक्टर कपिल मिश्रा और डॉक्टर दीप्ती मिश्रा के छायाचित्र और पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी लगाई गयी। कार्यक्रम में मशहूर गायक गुरशीत खनूजा की मनमोहक प्रस्तुति ने समां बांधा वहीँ डॉक्टर सुप्रिया भारतीयन की आवाज़ ने बतौर मंच संचालक पुरे कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।
विमोचन समारोह में वक्ताओं ने कृति को जीवनानुभवों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति बताते हुए कहा कि यह संग्रह मनुष्य के अंतर्मन में उठने वाली उन तरंगों का शब्दांकन है, जो सामान्यतः समय की रेत पर अनलिखी रह जाती हैं। अजीत सिंह गौर ने इन क्षणों को अपनी सहज, आत्मीय और मर्मस्पर्शी भाषा में इस प्रकार उकेरा है कि वे पाठक के भीतर एक स्थायी छाप छोड़ जाते हैं। कवि की रचनाओं में न तो आडंबर है, न ही शब्दों का अनावश्यक विस्तार; बल्कि एक शांत, संयत और विचारशील दृष्टि है, जो जीवन के सूक्ष्मतम बिंदुओं को भी अर्थपूर्ण बना देती है। यही कारण है कि शीर्षक “रेत पर उकेरे जो शब्द” अपने भीतर क्षणभंगुरता और स्थायित्व के द्वंद्व को अत्यंत प्रभावी ढंग से समेटे हुए है।
लेखक अजीत सिंह गौर के बारे में
मध्यप्रदेश के सागर में जन्मे अजीत सिंह गौर ने सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और एईसीएल में महाप्रबंधक (सिविल) के पद से सेवानिवृत्त हुए। यद्यपि उनका पेशेवर जीवन तकनीकी क्षेत्र से जुड़ा रहा, किंतु साहित्य और कला के प्रति उनका अनुराग बचपन से ही अक्षुण्ण बना रहा। युवावस्था में उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं, किंतु उन्होंने कभी स्वयं को प्रचारित करने का प्रयास नहीं किया।
प्रख्यात साहित्यकार सतीश जायसवाल द्वारा उन्हें “एक चुपचाप कवि” कहा जाना उनके व्यक्तित्व और सृजन-धर्मिता का सटीक परिचायक है। वे उन रचनाकारों में हैं, जो शब्दों के माध्यम से अधिक बोलते हैं, स्वयं नहीं। लंबे समय तक अपने सृजन को सीमित दायरे में संजोए रखने वाले गौर ने अंततः अपने शुभचिंतकों के आग्रह पर इस काव्य-संग्रह को प्रकाशित किया।
इस प्रकार, यह लोकार्पण समारोह न केवल एक पुस्तक के सार्वजनिक अवतरण का साक्षी बना, बल्कि उस रचनात्मक यात्रा का भी, जो वर्षों की निस्पृह साधना के बाद अब साहित्यिक संसार के समक्ष साकार रूप में उपस्थित हुई है। इस ख़ास अवसर पर कविता पाठ, सम्माननीय अतिथियों के सम्मान के बीच फोटो और पेंटिंग्स की प्रदर्शनी ने दर्शकों का मन मोह लिया।
डॉ. दीप्ति मिश्रा : स्पर्श में उपचार, रंगों में आत्मा
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपने कार्यों से अधिक अपने स्पर्श और संवेदनाओं से पहचाने जाते हैं—डॉ. दीप्ति मिश्रा उन्हीं में से एक हैं। बिलासपुर में बीते दो दशकों से वे एक चिकित्सक के रूप में शरीर के घाव भरती आई हैं, किंतु उनके भीतर एक ऐसा कोमल, सृजनशील मन भी है, जो रंगों, प्रकृति और जीवन के सूक्ष्म सौंदर्य को निरंतर संजोता रहता है। उनकी चिकित्सा केवल विज्ञान नहीं, एक करुणामय संवाद है—रोगी के दर्द से जुड़ने और उसे आत्मीयता से हल्का करने का प्रयास। वहीं, जब वे अपने ब्रश को थामती हैं, तो वही संवेदनशीलता जलरंगों में ढलकर कागज़ पर उतर आती है। उनकी पेंटिंग्स में प्रकृति का विस्तार, रंगों की शांति और मन की लय एक साथ दिखाई देती है—मानो वे हर चित्र के माध्यम से जीवन के किसी अनकहे भाव को अभिव्यक्त कर रही हों।
डॉ. दीप्ति का मन केवल अस्पताल या कैनवास तक सीमित नहीं है। वह पर्वतों की ऊंचाइयों में भी अपनी राह तलाशता है—एवरेस्ट बेस कैंप जैसे कठिन ट्रेक उनके साहस और आत्मविश्वास के प्रतीक हैं। वहीं, बागवानी में मिट्टी से संवाद, ऑर्गेनिक उपज में सादगी का स्वाद, कथक के लयबद्ध पदचाप में सौंदर्य की अभिव्यक्ति—ये सब उनके जीवन के विविध रंग हैं। वे प्रकृति और पशुओं के प्रति गहरे अनुराग से जुड़ी हुई एक सजग चेतना हैं—एक ऐसी संवेदनशील आत्मा, जो जीवन के हर रूप को सम्मान देती है। लेखन और पठन के माध्यम से वे अपने अनुभवों को शब्द देती हैं, तो कभी चुपचाप उन्हें अपने भीतर संजो भी लेती हैं। डॉ. दीप्ति मिश्रा का व्यक्तित्व इस सत्य का सुंदर उदाहरण है कि जब विज्ञान और कला, संवेदना और संकल्प, सेवा और सृजन एक साथ मिलते हैं, तब जीवन केवल जिया नहीं जाता—वह एक सुंदर अभिव्यक्ति बन जाता है।
डॉ. कपिल मिश्रा : स्पर्श में संबल, दृष्टि में प्रकृति का संगीत
जिनके भीतर विज्ञान की दृढ़ता और प्रकृति की कोमलता एक साथ सांस लेती है—डॉ. कपिल मिश्रा उन्हीं में से एक हैं। बिलासपुर में दो दशकों से वे एक ऑर्थोपेडिक सर्जन के रूप में टूटे हुए जीवन-लयों को फिर से जोड़ते आए हैं। उनके हाथों में केवल शल्य-कौशल नहीं, बल्कि एक ऐसा आश्वस्त कर देने वाला स्पर्श है, जो दर्द को सहने की शक्ति और चलने की नई उम्मीद देता है। परंतु उनके व्यक्तित्व की एक और दुनिया है—जहां वे शल्य-चिकित्सक नहीं, बल्कि प्रकृति के एक शांत दर्शक बन जाते हैं। पक्षियों के प्रति उनका अनुराग केवल एक शौक नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म संवाद है। वर्षों से वे बिलासपुर और उसके आसपास के आकाश में उड़ते पंखों की भाषा को पढ़ते आए हैं। उनके कैमरे में कैद हर पक्षी केवल एक छवि नहीं, बल्कि एक क्षण की कविता है—उड़ान, स्वतंत्रता और जीवन की अनंत संभावनाओं का प्रतीक।
डॉ. मिश्रा की दृष्टि में एक अनोखी स्थिरता है—वे शरीर की हड्डियों की जटिल संरचना को भी समझते हैं और प्रकृति की नाजुक लयों को भी। यही संतुलन उन्हें विशिष्ट बनाता है। वे जानते हैं कि जैसे शरीर को संतुलन की आवश्यकता होती है, वैसे ही मन को भी विस्तार और शांति की जरूरत होती है—और शायद इसी खोज में वे प्रकृति की ओर लौटते रहते हैं। यात्राएं उनके लिए केवल दूरी तय करना नहीं, बल्कि अनुभवों को आत्मसात करना है। संगीत उनके भीतर के मौन को स्वर देता है, और लेखन उनके विचारों को आकार। यहां तक कि वित्तीय बाजारों की जटिलताओं में भी वे एक प्रकार की लय और संरचना खोज लेते हैं—मानो हर क्षेत्र उनके लिए जीवन को समझने का एक अलग माध्यम हो।
डॉ. कपिल मिश्रा का व्यक्तित्व इस सत्य को सहजता से व्यक्त करता है कि मनुष्य केवल अपने पेशे तक सीमित नहीं होता। जब वह अपने भीतर के विविध आयामों को जीता है, तब वह केवल एक सफल चिकित्सक नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और पूर्ण मनुष्य बन जाता है—जो जीवन को ठीक भी करता है और उसे महसूस भी करता है।
