बिलासपुर। TODAY छत्तीसगढ़ / वर्दी केवल कर्तव्य का प्रतीक नहीं होती, वह त्याग, अनुशासन और अनगिनत अधूरे पारिवारिक पलों की भी साक्षी होती है। दिन-रात की ड्यूटी, त्योहारों पर घर से दूर रहना, और हर समय जिम्मेदारियों का बोझ, यह सब पुलिसकर्मियों के जीवन का हिस्सा होता है। लेकिन इन्हीं कठिन परिस्थितियों के बीच, जब उनके बच्चे अपने सपनों को साकार करते हैं, तो वह सफलता केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे पुलिस परिवार की सामूहिक जीत बन जाती है। बिलासपुर में ऐसा ही एक भावुक और गौरवपूर्ण क्षण तब सामने आया, जब विशेष शाखा में पदस्थ प्रधान आरक्षक सतलोक साय पैकरा की सुपुत्री कु. स्वाति पैकरा ने प्रथम प्रयास में ही सिविल जज बनकर न्यायपालिका में अपनी जगह बनाई।
यह उपलब्धि केवल एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि उस संघर्ष, अनुशासन और प्रेरणा की कहानी है, जो एक पुलिस परिवार के वातावरण में स्वाभाविक रूप से बच्चों के व्यक्तित्व में समाहित हो जाती है। स्वाति पैकरा बचपन से ही मेधावी और लक्ष्य के प्रति समर्पित रही हैं। उन्होंने डी.पी. विप्र कॉलेज, बिलासपुर से बीए एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और बिना किसी दूसरे प्रयास के सीधे न्यायिक सेवा में चयनित होकर यह साबित कर दिया कि यदि इरादे मजबूत हों, तो परिस्थितियां रास्ता नहीं रोक सकतीं।
इस गौरवपूर्ण अवसर पर पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग का व्यवहार केवल एक वरिष्ठ अधिकारी का नहीं, बल्कि एक संरक्षक और अभिभावक का था। जब स्वाति अपने पिता सतलोक साय पैकरा और जोनल पुलिस अधीक्षक विशेष शाखा श्रीमती दीपमाला कश्यप के साथ उनके कार्यालय पहुंचीं, तो वहां का माहौल औपचारिक कम और पारिवारिक अधिक था। श्री गर्ग ने स्वाति को पुष्पगुच्छ और स्मरणिका भेंट कर सम्मानित किया, मिठाई खिलाई और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए जीवन की एक महत्वपूर्ण सीख भी दी कि जीवन में आने वाली हर चुनौती का सामना ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ करना ही सच्ची सफलता का मार्ग है।
उस क्षण की सबसे मार्मिक तस्वीर वह थी, जब प्रधान आरक्षक सतलोक साय पैकरा अपनी बेटी को आईजीपी के हाथों सम्मानित होते देख भावुक हो उठे। एक पिता के लिए यह क्षण केवल गर्व का नहीं, बल्कि उन वर्षों की मेहनत और त्याग का प्रतिफल था, जब उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों के बीच अपनी बेटी के सपनों को पंख देने का प्रयास किया।
इसी तरह की एक और प्रेरणादायक कहानी प्रधान आरक्षक (चालक) उमाकांत कौशिक और श्रीमती मंदाकिनी कौशिक की सुपुत्री कु. संध्या कौशिक की है। संध्या ने न केवल कक्षा 12वीं में प्रदेश में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए, बल्कि नीट परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सिम्स, बिलासपुर से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। अपनी असाधारण प्रतिभा और समर्पण के बल पर उन्होंने एमबीबीएस के दौरान कुल पांच गोल्ड मेडल प्राप्त किए, जिनमें आप्थैल्मोलॉजी में सर्वोच्च अंक के लिए गोल्ड मेडल, डॉ. रमेश चन्द्र तिवारी मेमोरियल धन्वंतरि गोल्ड मेडल और डॉ. श्रुति चंद्राकर मेमोरियल गोल्ड मेडल शामिल हैं। वर्तमान में संध्या कौशिक केयर हॉस्पिटल, हैदराबाद में रेडियोलॉजी विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हैं, जो उनके निरंतर आगे बढ़ने के संकल्प का प्रमाण है।
इन दोनों बेटियों की उपलब्धियों पर पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग ने न केवल उन्हें सम्मानित किया, बल्कि उनके अभिभावकों को भी बधाई देते हुए कहा कि पुलिस परिवार के बच्चे सीमित समय और संसाधनों के बावजूद अपनी प्रतिभा और परिश्रम से हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने आश्वस्त किया कि पुलिस विभाग हमेशा अपने परिवार के बच्चों की शिक्षा और करियर को प्रोत्साहित करने के लिए तत्पर रहेगा।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बिलासपुर रजनेश सिंह ने भी स्वाति पैकरा और संध्या कौशिक की सफलता को पूरे पुलिस परिवार के लिए गर्व का विषय बताया। उन्होंने कहा कि जब पुलिसकर्मियों की बेटियां न्यायपालिका और चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाती हैं, तो यह केवल उनके परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बनता है।
जोनल पुलिस अधीक्षक विशेष शाखा श्रीमती दीपमाला कश्यप ने बताया कि अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (गुप्तवार्ता) श्री अमित कुमार ने भी स्वाति और संध्या दोनों की उपलब्धियों पर हर्ष व्यक्त करते हुए उन्हें और उनके अभिभावकों को हार्दिक बधाई दी है। यह सम्मान और शुभकामनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि पुलिस विभाग अपने परिवार के हर सदस्य की सफलता को अपनी सफलता मानता है।
स्वाति पैकरा और संध्या कौशिक की कहानियां केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह उन अनगिनत पुलिस परिवारों के संघर्ष, विश्वास और उम्मीदों की कहानी हैं, जो हर दिन कर्तव्य और परिवार के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करते हैं। यह सफलता बताती है कि वर्दी की सख्ती के पीछे एक संवेदनशील हृदय भी होता है, जो अपने बच्चों के सपनों को साकार होते देख गर्व और खुशी से भर उठता है।
आज जब स्वाति न्याय की कुर्सी की ओर बढ़ रही हैं और संध्या चिकित्सा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छू रही हैं, तब यह केवल उनके परिवार की नहीं, बल्कि पूरे पुलिस विभाग और समाज की जीत है। यह संदेश भी है कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती—यदि संकल्प मजबूत हो, तो वर्दी की छाया में पले सपने भी आसमान को छू सकते हैं।
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