"विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आने के बाद भाजपा शोक भवन में है, पतासाजी की जा रही जहां जहां फिर कमल खिलने की आशा थी वह मुरझा कैसे गया !"
कुछ अन्य कारण हैं जिस वजह राज्य के इन चुनाव में भाजपा की अधोगति हुई, उस पर पार्टी लेवल में चिंतन करना केन्द्र में मोदी सरकार की नीतियों की खिलाफत मान ना लिया जाए ,कदाचित इस वजह किसी का मुंह नहीं खुलेगा। बात कुछ कटु है पर ट्रोल करने वाले मित्र सोचे कि उन्होंने सोशल मीडिया में मोदी सरकार का खिलाफ आये विचारों और उन लेखकों की क्या गत बनाई। जिससे लिखने के पहले ट्रोल बाउंसरों से भयभीत हो कई ने नहीं लिखना ही बेहतर माना, ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अप्रत्यक्ष हमला था, क्योंकि 90 फीसद से अधिक प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया तो विज्ञापन पोषित हो मौन साध चुका था। जिसे गोदी मीडिया के नाम से सभी जानते हैं।
मोदी जी की छवि मेकिंग के लिए 18 घण्टे काम करने की बात उछली गयी, जबकि वह अधिक समय विदेश रहते थे। पाकिस्तान में सैनिकों की सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय 56 इंच को कैसे मिल सकता था, वह कोई सर्जिकल स्ट्राइक में जवानों का नेतृत्व करते सीमा पार तो गए नहीं थे। कश्मीर में जिस दल के साथ सरकार बनाई वह कितनी राष्ट्रवादी है,किसी से छिपा नहीं। मोदी जी की वाणी गरिमा की सीमा पार कर जाती ये आवाम को नहीं भाया। पेंशन और विधवा वाला उनकी कही बात संस्कार वाली पार्टी के चेहरे पर क्या शोभा देती थी।
राहुल की आलू से सोना बनने वाला वीडियो सब जानते थे तोड़-जोड़ है पर, फिर भी उसे घसीटा जाता रहा। मोदी जी जनता से सवाल पूछते, जबकि जनता उनसे राफेल, और अनिल अम्बनी पर राहुल जी आरोपों का बिंदुवार जवाब चाहती थी। दिवंगत पंडित नेहरू, के पीछे जाने क्यों मोदी जी ने अपना और आवाम का वक्त बर्बाद किया, 'नामदार और कामदार' का सही अर्थ कितने ने समझा और समझ आया तो माना, ये तो रामजी ही जाने।
उधर नागपुर के पितामह भीष्म मोदीजी को कोई समझाइश शायद नहीं दे सके। मन्दिर निर्माण के मुद्दे पर, साढ़े चार साल मोदी सरकार कुछ विशेष नहीं कर सकी। कालाधन , पेट्रोलिम में महंगाई के मसले ने देश में सीधा असर किया, रोज रुपये का लुढ़कना और डॉलर का रेट बढ़ने को केंद्र की कमजोरी माना गया। नोट बन्दी बाद, मोदी जी ने दावा किया कि इससे अलगाववादी और नक्सलियों की कमर टूट गई है। पर वैसा नहीं हुआ।उनके स्वच्छता अभियान के रत्न फोटो प्रकाशन बाद अपने काम में जुटे हैं।
राहुल गांधी ने बहुत तंज सहें पर जब आरोप लगाए तो देश को उनकी दिलेरी में मजबूत विपक्षी नेता दिखा, जो विकल्प बन सकता था। भाजपा शासित राज्य सरकार में कमी कम नहीं थी, सरकारी दफ्तरों में पेंडेंसी, और भ्रष्टाचार, गांवों की उपेक्षा, दिखावी विकास काम में इतना दमखम और आकर्षण नहीं था कि वो वोट में तब्दील हो सकें। राज्य के चुनाव को लिटमस टेस्ट मानना गया है। अब केंद्र सरकार के पास कुछ माह वक्त बचा है, सवाल यह है कि इस अल्प समय में कितना डेमेज कन्ट्रोल मोदी सरकार कर सकेगीं,क्योंकि उधर इस चुनाव बाद राहुल गांधी की अगुवाई में महागठबंधन की सम्भावना अब प्रबल हो चुकी हैं।
- प्राण चढ्ढा
पूर्व संपादक, दैनिक भास्कर
