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बलात्कारियों को बधिया बनाने के बारे में एक बार देश में चर्चा की जरूरत

हैदराबाद में एक युवती के दुपहिया को पंक्चर करके जिस तरह एक साजिश के साथ चार लोगों ने उससे बलात्कार किया और उसे जिंदा जलाकर मार डाला, उससे देश एक बार फिर हिल गया है कि बलात्कारों का आखिर क्या किया जाए? कल जब यह देश हिला हुआ ही था तो रांची से भी भूकंप का एक और झटका लगा, वहां कानून की पढ़ाई कर रही एक छात्रा से दर्जन भर लोगों ने बलात्कार किया था जो गिरफ्तार किए गए। कुछ पलों के लिए हिलते हुए इस देश में कुछ लोगों को यह भी याद आया कि बरसों पहले, सात-आठ बरस पहले दिल्ली में एक बस में युवती के साथ जिस तरह गैंगरेप किया गया था, और बलात्कारियों में एक नाबालिग भी था, उससे भी देश हिला था, खासा अधिक हिला था, और उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के कहे केन्द्र सरकार ने 3100 करोड़ रूपए का एक निर्भया फंड भी बनाया था कि बलात्कार रोके जा सकें। यह फंड खर्च नहीं हुआ, या थोड़ा सा खर्च हुआ तो महज इश्तहारों पर खर्च हो गया, और उसका मकसद तो किसी कोने से भी पूरा नहीं हुआ। आमतौर पर बलात्कार की खबरों पर हिलने वाला देश कुछ देर में हिलना बंद कर देता है, और फिर ऐसी हर खबर के साथ उसकी संवेदनशीलता घटती चलती हैं। धीरे-धीरे लोगों का हाल यहां तक सीमित हो जाता है कि बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला का जाति-धर्म क्या था, वह किस उम्र या आय वर्ग की थी, बलात्कारी किस जाति-धर्म के थे, कितने थे, बलात्कार के बाद उन्होंने कत्ल किया या नहीं? रेप की खबरों की ऐसी बुनियादी जानकारी तक सीमित समाज की संवेदनशीलता घटती चलती है और जब वारदात अधिक खूंखार हो जाती है, तो कुछेक मोमबत्तियां निकलती हैं, कुछेक प्रदर्शन होते हैं, और फिर बात आई-गई हो जाती है।
यह बात सही है कि हिन्दुस्तानी समाज में जब तक लड़कियों और महिलाओं का दर्जा बराबरी का नहीं होगा, तब तक बलात्कार कम नहीं होंगे, लेकिन हो सकता है कि बराबरी का दर्जा आने में दो सदियां लग जाएं। हो सकता है कि देश में महिला आरक्षण लागू करने में मौजूदा संसद सौ बरस और लगा दे, और उसके भी बाद एक सदी तक उसका असर धीरे-धीरे जमीन तक पहुंच सके। इसलिए समाज सुधार की ऐसी धीमी रफ्तार का लंबा इतिहास देखते हुए यह जरूरी है कि बलात्कार पर कुछ कड़ी कार्रवाई तय की जाए, जो कि मौजूदा कानूनों के तहत मुमकिन नहीं है। मौजूदा कानून बलात्कारी को एक लंबी कैद, अधिक से अधिक उम्रकैद या मरने तक की कैद दे सकते हैं, बलात्कार के बाद हत्या करने वालों को फांसी दे सकते हैं, लेकिन ऐसा दिखाई देता है कि समाज में इन दोनों सजाओं का कोई असर अब बाकी नहीं रहा है। लोग आए दिन खबरें पढ़ते हैं कि बलात्कारी को उम्रकैद हुई, लेकिन इससे लोगों के मन में सजा का खौफ रह नहीं गया है। ऐसे में मानव अधिकार आंदोलनकारियों की फिक्र को किनारे रखकर कुछ ऐसी सजा का प्रावधान करना चाहिए जिससे कि बलात्कार की हसरत रखने वाले लोगों के दिल कुछ हिलें। यह बात अलोकतांत्रिक और क्रूर लग सकती है, लेकिन बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला से पूछकर देखें कि वह कितनी लोकतांत्रिक और कितनी विनम्र रहना चाहती है, एक गैंगरेप के बाद भी। और गैंगरेप के बाद जलाकर मार डाली गई लडक़ी की राख से तो यह भी नहीं पूछा जा सकता।
दुनिया के कुछ देशों में बच्चों के साथ बलात्कार करने वालों को रसायनों से बधिया करने का एक कानून है। हिन्दुस्तान में भी इस पर कई बार बहस हो चुकी है, और आखिरकार इस सोच को खारिज किया गया कि यह बहुत अधिक अमानवीय सोच है। लेकिन आज देश भर में जिस धड़ल्ले से बलात्कार हो रहे हैं, और ऐसा लग रहा है कि हिन्दुस्तानी मर्दों की आबादी के एक हिस्से के लिए महिला से छेडख़ानी और बलात्कार पसंदीदा शगल बन गया है, उसे देखते हुए लगता है कि लोगों को एक अधिक कड़ी चेतावनी की जरूरत है। जिस देश के कानून में मौत की सजा को जारी रखने के अधिकतर लोग हिमायती हैं, वहां पर बलात्कारियों को रासायनिक इंजेक्शन से, या किसी सर्जरी से बधिया करने की सजा मौत की सजा से तो अधिक ही नर्मदिल होगी। अगर ऐसी सजा के बजाय किसी और तरीके से लोगों को लगता है कि बलात्कार रोके जा सकते हैं, तो उस तरीके को इस्तेमाल किया जाए। लेकिन आज के हालात में हमको जो बात सूझ रही है वह यही है कि एक ऐसी सजा का इंतजाम हो जिससे लोगों को अपनी देह की वह हिंसक मर्दानगी खो देने का खतरा दिखे, हमेशा के लिए खो देने का खतरा दिखे, तो हो सकता है कि उसका कुछ असर हो। बलात्कार की घटनाएं अधिकतर मामलों में रोकने के लायक नहीं रहती हैं। लड़कियों और महिलाओं को कामकाज के लिए बाहर निकलना ही होगा, सडक़ों से आना-जाना होगा, और ऐसे में पुलिस की हिफाजत की एक सीमा रहेगी। बहुत से मामलों में पुलिस बलात्कार में हिस्सेदार भी हो जाती है, इसलिए महज पुलिस के इंतजाम से बलात्कार रोके नहीं जा सकते, और न ही पुलिस का इतना बड़ा इंतजाम ही यह देश कर सकता है। ऐसे में समाज में जागरूकता और बराबरी का दर्जा स्थापित होने तक की सदियों के लिए ऐसे कानून की जरूरत है जिससे कम से कम कुछ अरसे के लिए तो लोगों के मन में जुर्म करने पर कानून का एक खौफ आए। आज देश के शरीफों के मन में तो कानून का खौफ दिखता है, लेकिन बलात्कारी सरीखे मुजरिमों के मन में नहीं दिखता, उसी का कुछ इलाज करना जरूरी है, और बलात्कारियों को बधिया बनाने के बारे में एक बार चर्चा छिडऩी चाहिए। 
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 नवंबर -

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