प्रियंका गांधी के राजनीति में आने से ऐसे आसार दिख ही रहे थे कि उन पर कई बातों को लेकर हमले होंगे, जिनमें सबसे बड़ा हमला कुनबापरस्ती को लेकर होगा, और इस बारे में अभी दो दिन पहले ही हमने लिखा है कि खुद भाजपा के भीतर आज कुनबापरस्ती कांगे्रस के टक्कर की ही है, और एनडीए में भाजपा के सहयोगी दलों का हाल तो यह है कि कई पार्टियों में परिवार से परे के कोई अध्यक्ष ही नहीं रहे हैं। कांगे्रस के साथ कम से कम ये बात तो रही है कि उसके कई अध्यक्ष और कई प्रधानमंत्री परिवार से बाहर के रहे हैं। एक वक्त तो पूरे बहुमत के साथ जब कांगे्रस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री चुना था, तब उन्होंने इस ओहदे पर मनमोहन सिंह को बिठाया था, वरना भाजपा की कम से कम दो महिला सांसदों के सिर मुंडाने की नौबत आ गई होती।
लेकिन कुनबापरस्ती की तोहमतों से परे भी कुछ आशंकाएं थीं जो अब एक-एक कर सामने आ रही हैं। भाजपा के एक बड़बोले बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय अपने बेटे के विधायक बन जाने के बाद कुनबापरस्ती पर तो कुछ नहीं बोल सकते, इसलिए उन्होंने प्रियंका को चॉकलेटी चेहरा कहकर अपनी भड़ास निकाल ली है। कुनैन जैसी जुबान के मुकाबले चॉकलेटी चेहरा बेहतर ही होता है, और उसमें कोई बुराई भी नहीं है। दूसरी तरफ भाजपा के एक बड़े नेता और भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रियंका को मानसिक रोगी कहा है और गांधी-नेहरू परिवार के लिए उनकी नफरत दशकों पुरानी भी है, और बड़ी हिंसक भी है। उनकी तीखी जुबान सोनिया-राहुल को लेकर, उनके परिवार को लेकर अक्सर हिंसक रहती है। भाजपा के कुछ और भगवाधारियों ने भी प्रियंका के आने पर ओछी बातें कही हैं, और जिस अखिलेश यादव को प्रियंका के आने से सबसे बड़ा फर्क पड़ सकता है उन्होंने सज्जनता के साथ प्रियंका का स्वागत किया है।
भारतीय राजनीति में ओछी और गंदी जुबान अखबारों और टीवी पर सुर्खियां तो बटोर सकती है, लेकिन उससे चुनाव में भी किसी को फायदा हुआ हो ऐसा नहीं होता। आम जनता चाहे चुनावी सभा में किसी घटिया बात पर ताली बजा दे, या सोशल मीडिया पर ओछी बात को आगे बढ़ा दे, चुनाव में वोट साबित करते हैं कि गंदी जुबान से नुकसान ही होता है, फायदा किसी का नहीं होता। दिक्कत यह है कि बड़े तजुर्बेकार नेता भी सुर्खियों के बुलबुलों को कांच के मजबूत गोले मान बैठते हैं, और वे यह भूल जाते हैं कि किसी भी तरह के झाग और बुलबुलों की जिंदगी बड़ी छोटी होती है। बात महज भाजपा की नहीं है, और बात सिर्फ प्रियंका पर शुरू होकर प्रियंका पर खत्म होने नहीं जा रही। पहले भी भारतीय राजनीति में किसी महिला के पति खोने को लेकर उसके लिए विधवा जैसे शब्द को एक गाली की तरह इस्तेमाल किया गया है, और हमारा पूरा भरोसा है कि हिंदुस्तान की आम जनता के मन में ऐसी ओछी बातों से कहने वाले के लिए हिकारत या नफरत ही पैदा होती है।

