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एक मौत जिसका जिम्मेदार बनने कोई तैयार नहीं !

छत्तीसगढ़ के भिलाई में शहर के बीच की सड़क पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए स्टेज बनाकर छोड़ दिया गया, और रात के अंधेरे में उससे टकराकर एक दुपहिया सवार मर गया। अगली सुबह जैसा तय था, वैसा कार्यक्रम हुआ, दूसरी तरफ पोस्टमार्टम वगैरह के बाद अंतिम संस्कार हुआ होगा। इसके बाद से यह विवाद चल रहा है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? भिलाई इस्पात संयंत्र जो कि उस इलाके का मालिक है, या भिलाई नगर निगम जिसका यह कार्यक्रम बताया जा रहा है, और जो अपने को आयोजक मानने से इंकार भी कर रहा है, या फिर स्थानीय सत्तारूढ़ विधायक जो कि इस कार्यक्रम के आयोजक बताए जा रहे हैं, और जो इसे नगर निगम का कार्यक्रम बता रहे हैं। अखबारी कतरनों को देखें तो ऐसा लगता है कि सड़क के बीच बनाए गए इस स्टेज के लिए मरने वाला ही जिम्मेदार था क्योंकि बाकी तो तमाम लोग इसकी जिम्मेदारी से हाथ धोकर महज कार्यक्रम की वाहवाही तक सीमित हैं। चूंकि कार्यक्रम में सत्तारूढ़ विधायक के अलावा गृहमंत्री भी शामिल थे, इसलिए पुलिस भी गोल-मोल जवाब दे रही है। बीएसपी, म्युनिसपिल, पुलिस, प्रशासन, और विधायक, ये सारे लोग जिम्मेदारी को किसी दूसरे पर फेंक रहे हैं, और मेहनत-मजदूरी करके देर रात घर लौटते एक कामगार इसमें मारा गया। 

इन दिनों सार्वजनिक जगहों पर तरह-तरह के सत्तारूढ़ कार्यक्रम करने का चलन बढ़ते चल रहा है। और सत्ता का मतलब महज सरकार या स्थानीय संस्था पर काबिज राजनीतिक सत्ता नहीं है, मीडिया की ताकत अपने-आपमें एक सत्ता है, और कहीं बाग-बगीचों में, तो कहीं खेल के मैदानों पर मीडिया घरानों के कराए गए कारोबारी कार्यक्रम छाए रहते हैं, फिर चाहे लोगों का बगीचे जाना रूके, या बच्चों का खेलना रूके। कहने के लिए सड़कों के नियम हैं कि उन्हें रोका नहीं जाना चाहिए, खेल के मैदानों के लिए तो राज्य सरकार के बार-बार के वायदे हैं कि उनका गैरखेल इस्तेमाल नहीं होगा, लेकिन राजधानी रायपुर में ही हम देखते हैं कि हर बड़े खेल मैदान पर धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम चलते हैं, कई संगठनों के व्यापार मेले चलते हैं, मीना बाजार लगे रहते हैं, और बड़े-बड़े अखबार वहां पर रियल स्टेट या ऑटो मोबाइल के मेले लगाते हैं। इन सबके बीच जिन दिनों में वहां कुछ नहीं लगे रहता, उतने दिन मैदान पर ऐसे गड्ढे रहते हैं कि वे खेलने लायक रह नहीं गए हैं। 

राज्य की सार्वजनिक जगहों को लेकर सरकार की कोई साफ नीति नहीं है। अगर कागज पर कुछ फैसले लिए भी गए हैं, तो कोई भी संगठन जाकर उनके खिलाफ इस्तेमाल की इजाजत ले आते हैं। अधिकतर सार्वजनिक कार्यक्रमों को ऐसी जगहों पर किया जाता है कि लोगों के खेलकूद, उनकी सैर, इन सब पर सीधी चोट होती है। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म होना चाहिए। मैदान खेल के लिए रहें, सड़कें चलने के लिए रहें, बाग-बगीचे सैर के लिए रहें, और स्टेडियम अधिकतम समय टूर्नामेंट के लिए रहें। राज्य में आम लोगों की कोई जुबान नहीं है, और जैसे ही कोई संगठन सत्तारूढ़ लोगों या ताकतवर लोगों का साथ पा जाते हैं वे सार्वजनिक जगहों पर कब्जा पा जाते हैं। आम जनता के आम लगते हुए हक उनकी रोज की जिंदगी के लिए बहुत खास होते हैं, और कोई भी जागरूक समाज अपने लोगों के हक इस तरह नहीं कुचलने देता। जनता के बीच के संगठनों को न सिर्फ ऐसे हादसे रोकने के लिए, बल्कि अपने रोज के आम हकों पर दावा करने के लिए भी खुद खड़ा होना होगा। भिलाई स्टील प्लांट की टाऊनशिप प्रदेश की सबसे अधिक व्यवस्थित और योजनाबद्ध बस्ती है, उसके बीच इस तरह का सड़क हादसा और अधिक गंभीर बात है। छोटी-छोटी जगहों पर ऐसे छोटे-बड़े अस्थाई कब्जों का सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए। इसमें राज्य सरकार से लेकर स्थानीय संस्थाओं तक को अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। 
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