कोलकाता में ममता बैनर्जी की पहल पर विपक्ष की कोई डेढ़ दर्जन पार्टियों ने जिस तरह भाजपा और मोदी के खिलाफ एकजुटता दिखाई, उस पर आनन-फानन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिक्रिया आई कि ये तमाम लोग अपने कुनबों को आगे बढ़ाने के लिए इकट्ठा हुए, और अपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए भी। मानो विपक्ष के इस ऐतिहासिक प्रदर्शन पर निशाना लगाना हो, इसके तुरंत बाद मोदी ने भारतीय फौज के लिए बन रहे एक टैंक की सवारी करते हुए उसकी तोप के साथ अपनी तस्वीरें खिंचवाईं, और चारों तरफ पोस्ट कीं। भाजपा की ओर से इस गठबंधन को बहुत सारी पार्टियों का गठबंधन बताते हुए इसे अस्थिर और कमजोर कहा गया। और इसी से लोगों को याद पड़ा कि आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद जिस एनडीए गठबंधन के मुखिया हैं, उसमें कोलकाता रैली से ज्यादा पार्टियां शामिल हैं, और एनडीए-1 के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इससे भी बड़ा गठबंधन चलाया था। इसलिए गठबंधन को कोसते हुए भाजपा को अपना वर्तमान, और दस बरस पहले का इतिहास, दोनों ही देख लेना था।
जहां तक भाजपा का सवाल है, वह एनडीए नाम के एक ऐसे गठबंधन की मुखिया है जिसके बहुत से भागीदार अपनी अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाते हुए कुनबापरस्ती पर चल रही पार्टियां हैं। महबूबा मुफ्ती से लेकर बादल तक, और उद्धव ठाकरे से लेकर पासवान तक अनगिनत और नेता दूसरी या तीसरी पीढ़ी के नेता हैं, और उनकी पार्टियां घरेलू संगठन हैं। इससे परे यह भी समझने की जरूरत है कि आज जो पार्टियां ममता के साथ खड़ी हैं, उसमें से भी कुछ पार्टियां वाजपेयी की लीडरशिप वाले एनडीए में शामिल थीं, वे तब भी कुनबापरस्त थीं, और आज भी कुनबापरस्त हैं। इसलिए अपनी, या अपने साथियों की कुनबापरस्ती को अनदेखा करके विरोधी कुनबापरस्ती पर हमला भी नाजायज और बेअसर है, और जब खुद गठबंधन की वजह से सत्ता पर हैं, तो विपक्षी गठबंधन के गठबंधन होने को कोसना भी नाजायज है।
राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोगों को लगता है कि वे वक्त के साथ-साथ अपनी बात बदल सकते हैं, और अपने निशाने चुन सकते हैं। लेकिन सच तो यह है कि लोगों की याददाश्त पहले के मुकाबले कुछ बेहतर है, कुछ लोगों को गूगल की मदद भी हासिल है। इसलिए लोग गैस सिलेंडरों की महंगाई के साथ प्रदर्शन करने वाली सुषमा-स्मृति की तस्वीरें पोस्ट करते हैं, मोदी के तो दर्जनों ऐसे वीडियो पोस्ट करते हैं जिसमें वे चुनावी सभाओं में ऐसी बातें कह चुके हैं कि आज जिनके खिलाफ वे बोलते हैं। ऐसे वीडियो पोस्ट करके लोग पुरानी बातों को याद दिलाते हैं, और आज की बातों का खोखलापन साबित करते हैं। दरअसल बहुत अधिक बोलने की एक दिक्कत यह भी रहती है कि आप इतने अधिक पैरों के निशान और सुबूत छोड़ते जाते हैं कि वे सामने आकर आपका मुंह चिढ़ाने लगते हैं। यह बात महज बीजेपी पर लागू नहीं होती है, और न ही अकेले मोदी पर। बहुत सी पार्टियों के बहुत से नेताओं का बीता कल आज सामने आकर उन्हें चुनौती देता है, और उनके आने वाले कल पर असर डालता है।
जिन लोगों को क्षेत्रीय दल नापसंद हैं, जिनको गठबंधन नापसंद है, उनको यह भी याद रखना चाहिए कि भाजपा के नेता देश में तीन बार मंत्री-प्रधानमंत्री बने। आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो अटल-अडवानी सहित कई भाजपा नेताओं को पहली बार केन्द्रीय मंत्री बनने मिला। दूसरी और तीसरी बार अटल सरकार बनने पर पहली बार भाजपा को पीएम की कुर्सी मिली, और बहुत से भाजपा नेता एनडीए मंत्रिमंडल में मंत्री रहे। अब नरेन्द्र मोदी कई किस्म के अस्वाभाविक दिखते समीकरणों के चलते प्रधानमंत्री बने हैं। इसलिए गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय दलों को कोसना ठीक नहीं है। अगर क्षेत्रीय दल न होते तो भाजपा संसद में एक वक्त एक छोटे से क्षेत्रीय दल से भी छोटी पार्टी थी, और उसके कुल दो सांसद थे। दो सांसदों से लेकर आज संसद में करीब पौने तीन सौ सांसद तक पहुंचने वाली भाजपा का यह सफर कदम-कदम पर क्षेत्रीय दलों की पीठ पर सवार होकर ही पूरा हुआ है। इसलिए सार्वजनिक रूप से आलोचना करते हुए लोगों को अपने सार्वजनिक इतिहास को याद रखना चाहिए। अटल बिहारी के एनडीए में भाजपा के तेरह सहयोगी दल थे, और आज इसमें, और इसे समर्थन देने वालों में बयालीस दल शामिल हैं। गठबंधन के तेरह दलों को छोड़ दें, तो बाकी पार्टियों के लोग न लोकसभा में हैं न राज्यसभा में हैं। ऐसे में दूसरों के गठबंधन हर हंसने का हक पता नहीं भाजपा को कैसे मिला हुआ लगता है?

